Friday, August 10, 2007

123

“बाबु जी, काटो मत, कितनी जोर से कट्टे हो ? खा जायोगे क्या मेरी चूची ? गुस्से से मंजू बाई चिल्लाई और फिर हसने लगी.

मैं उसपर चढ़ कर उसें छोड़ रहा था और उसकी एक चूची मुंह मैं लेकर चूस रहा था. उसका छरहरा सांवला शरीर मेरे निचे दबा था और उसकी मजबूत टाँगे मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपटी हुई थी. मैं इतनी मस्ती में था की वासना सेहन नहीं होने से मैंने मंजू के निप्प्ले को दांतों में दबा कर चबा डाला था और वो चिल्ला उठी थी. मैंने उसकी बात को उन्सुनी करके उसकी आधी चूची को मुंह में भर लिया और फिर से उसें दांतों से काटने लगा.

उसके फिर से चीखने के पहले मैंने अपने मुंह से उसकी चूची निकली और उसके होंठों को अपने होंठों में दबाकर उसकी आवाज बंद कर दी. उसके होंठों को चूसते हुए मैं अब उसें कास कर छोड़ने लगा. व्हो भी आह्ह्ह न आह्ह्ह स्स्श्ह की दबी हुई आवाज निकलते हुए मुझसे चिपट कर छात्पटाने लगी. यह उसके झड़ने के करीब आने की निशानी थी.

दो तीन धक्कों के बाद ही उसके बंद मुंह से एक चीख निकली और उसने अपनी झीब मेरे मुंह में दाल दी. उसका शरीर कदा हो गया था और वो थरथराने लगी. उसकी चूत में से अब ढेर सारा पानी बह रहा था. मैंने भी तीन चार और करारे धक्के लगाये और अपना लैंड उसकी चूत में पूरा अंदर घुसेड कर झड गया.
थोड़ी देर बाद मैं लुदाख कर उसके उप्पेर से अलग हुआ और लेट कर सुस्ताने लगा.

मंजू बाई उठकर अपने कपडे पहनने लगी. उसकी चूची पर मेरे दांतों के गहरे निशाँ थे, उन्हें सहलाते हुए वेह मुझसे शिकायत करते हुए बोली, “ बाबूजी, क्यों काटतें हो मेरी चूची को बार बार, मुझे बहुत दुखता हैं, परसों तो तुमने थोडा खून भी निकल दिया था;”. उसकी आवाज में शिकायत के साथ साथ हल्का सा नखरा भी था. उसे दर्द तो हुआ होगा पर मेरी उस दुष्ट हरकत पर मज़ा भी आया था.

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कराते हुए उसे बाहों में खिंच कर उसके सांवले होंठों का चुम्बन लेते हुए सोचने लगा की क्या मेरी तकदीर है जो इतनी गरम चुड़ैल औरत मेरे पल्ले पड़ी है. एक नौकरानी थी, अब मेरी प्रेमिका बन गयी थी मंजू बाई! यह अफसाना कैसे शुरू हुआ उसे मैं याद कर रहा था।




मैं कुछ ही महीने पहले यहाँ नौकरी पर आया था. बी.इ. करने के बाद यह मेरी पहली नौकरी थी. फैक्ट्री एक छोटे सेहर के बहार कैमोर गाँव के पास थी, वहां कोई आना पसंद नहीं करता था इसलिए एक तगड़ी सलारी के साथ कंपनी ने मुझे कालोनी में एक बंगले भी रहने को दे दिया था. कालोनी सेहर से दूर थी और इसलिए नौकरों के लिए छोटे कुँर्टर भी हर बंगले में बने थे.

मैं अभी अकेला ही था, अभी शादी नहीं हुई थी. मेरे बंगले के कुँर्टर में मंजू बाई पहले से ही रहती थी. उस बंगले में रहने वाले लोगो के घर का सारा काम काज करने के लिए कंपनी ने उसे रखा यह. वेह पास के गाँव कित ही पर उसे फ्री में रहने ले लिए कुँर्टर और थोड़ी तनख्वाह भी कंपनी देती थी इसलिए वो बंगले में ही रहती थी.

वैसे तो उसका पति भी था. मैंने उसे बस एक दो बार देखा था. शायद उसका और कही लफड़ा था और शराब की लत थी इसलिए मंजू से उसका खूब झगडा होता था. वो मंजू की गाली गलौच से घबराता था इसलिए अक्सर घर से महीनो गायब रहता था.

मंजू मेरे घर का सारा काम करती थी और बड़े प्यार से मन लगाकर करती थी. खाना बनाना, कपडे धोना, साफ़ सफाई करना, मेरे लिए बाज़ार से जरूरत की सब चीजें ले आना, ये सब वही करती थी. मुझे कोई तकलीफ नहीं होने देती थी. उसकी इमानदारी और मीठे स्वभाव के कारण उसपर मेरा पूरा विश्वाश हो गया था. मैंने घर की पूरी जिम्मेदारी उसपर दाल दी थी और उसे उप्पेर से तीन सौ रूपए भी देता था.

उसके कहने से मैंने बंगले के बाथरूम में उसे नहाने धोने की इजाजत भी दे दी थी क्योंकि नौकरों के कुँर्टर में बाथरूम ढंग का नहीं था. गरीबी के बावजूद साफ़ सुथरा रहने का उसे बहुत शौक था और इसीलिए बंगले के बाथरूम में नहाने की इजाजत मिलने से वो बहुत खुश थी. दिन में दो बार नहाती और हमेशा सांफ सुथरी रहती, नहीं तो नौकरानिया अक्सर इतनी सफाई से नहीं रहती. मुझे बाबूजी कहकर बुलाती थी और मैं उसे मंजूबाई कहता था. मेरा बर्ताव उसे एकदम अच्चा और सब्भय था, नौकरों जैसा नहीं.





यहाँ आये हुए मुझे दो महीने हो गए थे. उन दो महीनो मैं मैंने मंजू पर एक औरत के रूप मैं जयादा धयान नहीं दिया था. मुझे उसकी उम्र का भी ठीक अंदाज नहीं था, हाँ मुझ से काफी बड़ी हैं ये मालूम था. इस वर्ग की औरतें अक्सर तीस से लेकर पैंतालिस टेक कि सी दिखती हैं, समझ में नहीं आता की उनकी असली उम्र क्या है. कुछ जल्दी बूढी लगने लगती हैं तो कुछ पचास की होकर भी तीस पैंतीस की दिखती हैं.

मंजू की उम्र मेरे ख़याल मैं सेंतीस अर्द्तीस की होगी. पर लगती थी की जैसे तीस साल की जवान औरत हो. शरीर एकदम मजबूत, छरहरा और कसा हुआ था. काम करने की फुर्ती देखकर मैं मन ही मन उसकी दाद देता था की क्या एनेर्ग्य है इस औरत मैं. कभी कभी वेह पान भी खाती थी और तब उसके सांवले होंठ लाल हो जाते. मुझे पान का शौक नहीं हैं पर जब वेह पास से गुजरती तो उसके खाए पान की सुगंध मुझे बड़ी अच्च्ची लगती थी.

अब इतने करीब रहने के बाद यह स्वाभाविक था किड हीरे धीरे मैं उसकी तरफ एक नौकरानी ही नहीं, एक औरत की तरह देखने लग जाऊं. मैं भी एक तेईस(२३) साल का जवान था, और जवानी अपने रंग दिखाएगी ही. काम ख़तम होने पर घर आता तो कुछ करने के लिए नहीं था सिवाए टीवी देखने के पढने के. कभी कभी क्लब हो आता था पर मेरे अकेलेपन के स्वभाव के कारण अक्सर घर मैं ही रहना पसंद करता था. मंजू काम करती रहती और मेरी नज़र अपने आप उसके फुर्तीले बदन पर जा कर टिक जाती.

ऐसा शायद चलता रहता पर तभी एक घटना ऐसी हुई की मंजू के प्रति मेरी भावनाए अचानक बदल गयी.

एक दिन बद्मिन्तों खेलते हुए मेरे पाँव मैं मोचा गयी. शाम तक पैर सूज गया. दुसरे दिन काम पर भी

नहीं जा सका. डॉक्टर की लिखी दावा ली और मरहम लगाया पर दर्द कम नहीं हो रहा था. मंजू मेरी हालत देख कर मुझसे बोली, “बाबूजी, पैर की मालिश कर दूं?”
मैंने माना किया. मुझे भरोसा नहीं था, डरता था की पैर और ना सूज जाए. और वैसे भी एक औरत से पैर दबवाना मुझे ठीक नहीं लग रहा था. वेह जिद करने लगी, मेरे अच्छे बर्ताव की वजह से मुझको अब वेह बहुत मानती थी और मेरी सेवा का यह मौका नहीं छोड़ना चाहती थी, “एकदम आराम जाएगा बाबूजी, देखो तो. मैं बहुत अच्चा मालिश करती हूँ, गाँव में तो किसी को ऐसा कुछ होता है तो मुझे ही बुलाते है”.

उसके चेहरे के उत्साह को देखकर मैंने हाँ कर दी, की उसे बुरा ना लगे. उसने मुझे पलंग पर लीताया और जाकर गरम करके तेल ले आई. फिर पजामा उप्पेर करके मेरे पैरों की मालिश करने लगी. उसके हाथ में सच मैं जादू था. बहुत अच्चा लग रहा था. काम करके उसके हाथ जरा कड़े हो गए थे फिर भी उनका दवाब मेरे पैर को बहुत आराम दे रहा था.

पास से अमिने पहली बार मंजू को ठीक से देखा था. वेह मालिश करने मैं लगी हुई थी इसलिए उसका ध्यान मेरे चेहरे पर नहीं था. मैं चुपचाप उसे घूरने लगा. सादे कपड़ो में लिपटे उसके सीधे साधे रूप के निचे छुपी उसके बदन की मादकता मुझे महसूस होने लगी.



दिखने में वेह साधारण थी. बाल जुड़े में बाँध रखे थे, उन्मी एक फूलों की वेणी थी. थी तो वेह सांवली पर उसकी त्वचा एकदम चिकनी और दमकती हिथि. माथे पर बड़ी बिंदी थी और नाक में नथनी पहने थी. वेह गाँव की औरतों जैसे धोती की तरह साडी पहने थी जिसमे से उसके चिकने सुडौल पैर और मांसल पिन्दलियाँ दिख रही थी. चोली और साडी के बीच दिखती उसकी पीन्थ और कमर भी एकदम सपाट और मुलायम थी. चोली के निचे शायद वेह कुछ नहीं पहनती थी क्योंकि कटोरी से तेल लेने को जब वेह मुडती तो पीछे से उसकी चोली के पतले कपडे में से ब्रा का कोई स्तरप नहीं दिख रहा था.

आँचल उसने कमर में खोंस रखा था और उसके निचे से उसकी छाती का हल्का सा उभार दीखता था. उसके स्तन जयादा बड़े नहीं थे पर ऐसा लगता था की जितनी भी हैं, काफी सख्त और कसे हुए हैं. उसके उस दुबले पतले छरहरे पर एकदम स्वस्थ और कसे हुए चिकने शरीर को देखकर पहली बार मुझे समझ में आया की जब किसी औरत को “त्वंगी” कहते है, याने जिसका बदन किसी पेड़ के ताने जैसा होता है, तो इसका क्या मतलब है.

उसके हांथों के स्पर्श और पास से दीखते उसके सादे पर स्वस्थ रूप ने मुझपर ऐसा जादू किया की जो होना था वेह हो कर रहा. मेरा लैंड सीए उठाने लगा. मैं परेशां था, उसके सामने उसे दबाने को कुछ कर भी नहीं सकता था. इसलिए पलट कर पेट के बल सो गया. वेह कुछ नहीं बोली, पीछे से मेरे टखने की मालिश करती रही. अब मैं उसके बारे में कुछ भी सोचने को आज़ाद था. मैं मन ही मन लड्डू खाने लगा. मंजू बाई नंगी कैसी दिखेगी! उसे भींच कर उसे छोड़ने में क्या मज़ा आएगा ! मेरा लैंड तन्ना कर खड़ा हो गया.



दस मिनट बाद वेह बोली, “ अब सीधे हो जाओ बाबूजी, मैं पैर मोड़ कर मालिश करूंगी, आप एकदम सीधे चलने लगोगे”.

मैं आनाकानी करने लगा. “हो गया, बाई, अब अच्चा लग रहा है, तुम जाओ.” आखिर खड़ा लैंड उसे कैसे दिखता! पर वेह नहीं मानी और मजबूर होकर मैंने करवट बदली और कुरते से लैंड के उभार को ढँक कर मन ही मन प्राथना करने लगा की उसे मेरा खड़ा लैंड ना दिखे. वैसे कुरते मैं भी अब तम्बू बन गया था सो अब छुपने की कोई गुन्जायिश नहीं थी.

वेह कुछ ना बोली और पांच मिनट में मालिश ख़तम करके चली गयी. “ बस हो गया बाबूजी, अब आराम करो आप”. कमरे से बाहर जाते जाते हुए मुस्करा कर बोली,” अब देखो बाबूजी, तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी”. उसकी आँखों में एक चमक सिट ही. मैं सोचता रहा की उसके इस कहने में और कुछ मतलब तो नहीं छुपा.

उसकी मालिश से मैं उसी दिन चलने फिरने लगा. दुसरे दिन उसने फिर एक बार मालिश की, और मेरा पीर पूरी तरह से ठीक हो गया. इसबार मैं पूरा सावधान था और अपने लैंड पर मैंने पूरा कण्ट्रोल रखा. ना जाने क्यों मुझे लगा की जाते जाते मंजू बाई कुछ उदास सी लगी.
अब उसको देखने की मेरी नज़र बदल सी गयी थी. जब भी मैं घर मैं होता तो उसकी नज़र बचाकर उसके शरीर को घूरने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता था. खाना बनाते समय जब वेह कित्चें के चबूतरे के पास कड़ी होती तो पीछे से उसे देखना मुझे बहुत अच्चा लगता, उसकी चिकनी पीठ और गार्डेन मुझ पर जादू सा कर देती, मैं बार बार किसी ना किसी बहाने से कित्चें के दरवाजे से गुजरता और मन भर कर उसे पीछे से देखता. जब वेह चलती तो मैं उसके चुतादों और पिंडलियों को घूरता. उसके चुतद छोटे थे पर एकदम गोल और सख्त थे. जब वेह अपने पंजो पर कड़ी होकर उप्पेर देखते हुए कपडे सुखाने को डालती तो उसके छोटे मुम्मे तन कर उसके आँचल में से अपनी मस्ती दिखने लगते.


उसे भी मेरी इस हालत का अंदाज़ा हो गया होगा,आखिर मालिश करते समय कुरते के निचे से मेरा खड़ा लैंड उसने देखा ही था. पर नाराज होने और बुरा मानने के बजाये वेह अब मेरे सामने कुछ कुछ नखरे दिखने लगी थी. बार बार आकार मुझसे बातें करती, कभी बेमतलब मेरी और देखकर हलके से हंस देती. उसकी हंसी भी एकदम लुभावनी थी, हँसे समय उसकी मुस्कान बड़ी मीठी होती और उसके सफ़ेद दांत और गुलाबी मसूड़े दीखते क्योंकि उसका उपरी होंठ एक खास अंदाज़ मई उप्पेर कीओर खुल जाता.

मैं समझ गया की शायद वेह भी चुदासी की भूखी थी और मुझे रिझाने की कोशिश कर रही थी. आखिर उस जैसी नौकरानी को मेरे जैसा उच्च वर्गीय नौजवान कहाँ मिलने वाला था? उसका पति तो नालायक शराबी था ही, उसे सम्बन्ध तो मंजू ने कब के तोड़ लिए थे. मुझे यकीं हो गया था की बस मेरे पहल करने की देर है यह शिकार खुद मेरे पंजे मैं आ फंसेगा.
पर मैंने कोई पहल नहीं की. डर था कुछ लफड़ा ना हो जाए, और अगर मैंने मंजू को समझने में कोई भूल की हो तो फिर तो बहुत तमाशा हो जाएगा. वेह चिल्ला कर पूरी कालोनी सिर पर ना उठा ले, नहीं तो कंपनी में मुंह दिखने की जगह भी ना मिलेगी.

पर मंजू ने मेरी नज़र की भूख पहचान लिट ही. अब उसने आगे कदम बढ़ाना शुरू कर दिया. वेह थी बड़ी चालाक, मेरे ख़याल से उसने मन में थान लिट ही की मुझे फंसा कर रहेगी. अब वेह मेरे सामने होती, तो उसका आँचल बार बार गिर जाता. ख़ास कर मेरे कमरे में झाड़ू लगाते हुए तो उसका आँचल गिरा ही रहता. वैसे ही मुझे खाना परोसते समय उसका आँचल अक्सर खिसकने लगा और वैसे में ही वो झुक झुक कर मुझे खाना परोसती. अन्दर ब्रा तो वो पहनती नहीं थी इसलिए ढले आँचल के कारण उसकी चोली के उप्पेर से उसके छोटे और कड़े मम्मो और उनकी घुन्दियों का आकार सांफ सांफ दीखता. भले छोटे हों पर बड़े खूबसूरत मम्मे थे उसके. बड़ी मुश्किल से मैं अपने आप को संभाल पाटा, वर्ना लगता तो था की अभी उन कबूतरों को पकड़ लूं और मसल डालूँ, चूस लूं.
मैं अब उसके मोहजाल में पूरा फँस चुक्का था. रोज़ रात को मुठ्मार्ता तो इस तीखी नौकरानी के नाम से. उसकी नज़रों से नज़र मिलाना मैंने छोड़ दिया था की उसे मेरी नज़रों की वासना की भूख दिख ना जाए. बार बार लगता की उसे उठा कर पलंग पर ले जाऊं और कचकच छोड़ मारूं. अक्सर खाना खाने के बाद मैं दस मिनट तक बैठा रहता, उठता नहीं था ताकि मेरा ताना लैंड उसको दिख ना जाएँ.

यह जयादा दिन चलने वाला नहीं था. आखिर एक शनिवार को छुट्टी के दिन की दोपहर मैं बाँध टूट ही गया. उस दिन खाना परोसते हुए मंजू चीख पड़ी की चिन्ति काट रही है और मेरे सामने अपनी सारी उठा कर अपनी टांगो में चिन्ति धुन्धने का नाटक करने लगी. उसकी पुष्ट सुदौल सांवली चिकनी झांघे पहली बार मैंने देखि थी. उसने साडी गुलाबी पेंटी पहनी हुई थी. उस तंग पंटी में से उसकी फूली बुर का उभार सांफ दिख रहा था. साथ ही पंटी के बीच के संकरे पत्ते के दोनों और से घनी काली झानतें बाहर निकल रही थी. एकदम देसी नजारा था. और यह नजारा मुझे पूरे पांच मिनट मंजू ने दिखाया. ऊईई ऊईई करती हुई मेरी और देखकर हँसते हुए वो चिन्ति ढूंढती रही जो आखिर तक नहीं मिली.

मैंने खाना किसी तरह ख़तम किया और आराम करने के लिए बेडरूम में आ गया. दरवाजा उदका कर मैं सीधा पलंग पर गया और लैंड हाँथ में लेकर हिलाने लगा. मंजू की वे चिकनी झंघे मेरी आँखों के सामने तैर रही थी. मैं हथेली में लैंड पकड़ कर उसे मुठीयाने लगा, मानो मंजू की टांगों पर उसे रगड़ रहा हूँ.

इतने में बेडरूम का दरवाजा खुला और मंजू अन्दर आ गयी.




वेह चतुर औरत जानबूझ कर मुझे धुला पजामा देने का बहाना करके आई थी. दरवाजे की सिटकनी मैं लगाना भूल गया था इसीलिए वो सीधे अन्दर घूस आई थी. मुझे मुठ मारते देख कर वहीँ कड़ी हो गयी और मुझे देखने लगी.

मैं सकते में आकार रुक गया. अब भी मेरा तन्नाया हुआ लैंड मेरी मुठ्ठी में था. मंजू के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी, मेरी और देखकर हंसी और आकार मेरे पास पलंग पर बैठ गयी. “क्या बाबूजी, मैं यहाँ हूँ आपकी हर खातिर और सेवा करने को फिर भी ऐसा बचपना करते हो! मुझे मालूम है तुम्हारे मन में क्या है. बिलकुल अनादी हो आप बाबीजी, इतने दिनों से इशारे कर रही हूँ पर आप नहीं समझते, क्या भोंदू हो बिलकुल आप!”

मैं चुप था, उसकी और देख कर शर्मा कर बस हंस दिया. आखिर मेरी चोरी पकड़ी गयी थी. मेरी हालत देख कर मंजू की आँखें चमक उठी,” मेरे नाम से सदका लगा रहे थे बाबूजी? अरे मैं यहाँ आपकी सेवा में तैयार हूँ और आप मुठ मार रहे हो. चलो अब हाथ हटाओ, मैं दिखाती हूँ की ऐसे सुंदर लौड़े की पूजा कैसे की जाती है”. और मेरे हाथ से लैंड निकाल कर उसने अपने हाथ में ले लिया और उसे हथेलियों के बीच रगड़ने लगी.

उसकी खुरदरी हथेलियों के रगड़ने से मेरा लैंड पागल सा हो गया. मुझे लग रहा था की मंजू को बान्होमें भींच लूं और उस पर चढ़ जाऊं, पर उसके पहले ही उसने अचानक मेरी गोद में सिर झुककर मेरा सुपदा अपने मुंह में ले लिया और मेरे लैंड को चूसने लगी. उसके गीले तपते मुंह और मछली सी फुदकती जीभ ने मेरे लैंड को ऐसा तद्पाया की मैं झड़ने को आ गया. मैं चुप रहा और मज़ा लेने लगा. सोचा अब जो होगा देखा जाएगा. हाथ बदकार मैंने उसके मम्मे पकड़ लिए. क्या माल था! सेब से कड़े थे उसके स्तन.

सुपदा चूसते चूसते वेह अपनी एक मुठ्ठी में लैंड का डंडा पकड़कर सदका लगा रही थी, बीच में आँखे उप्पेर करके मेरी आँखों में देखती और फिर चूसने लग जाती. उसकी आँखों में इतनी शैतानी खिलखिला रही थी की दो मिनट में मैं हुमक कर झड गया. “मंजू बाई, मुंह हटा लो, मैं झड़ने वाला हूँ ओ:ओ:, मैं कहता रह गया पर उसने तो और लैंड को मुंह में अन्दर तक ले लिया और जब तक चूसती रही जब तक मेरा पूरा वीर्य उसके हलक के निचे नहीं उतर गया”.

मैंने हाँफते हुए उसे पूंछा, “कैसी हो तुम बाई, अरे मुंह बाजु में क्यों नहीं किय, मैंने बोला तो था की झड़ने के पहले!”

“अरे मैं क्या पगली हूँ बाबूजी इतनी मस्त मलाई छोड़ देने को? तुम्हारे जैसा खूबसूरत लौदा कहाँ हम गरीबों को नसीब होता हैं! ये तो भगवान् का प्रशाद है हमारे लिए” वेह बड़े लाड के अंदाज़ में बोली. उसकी इस अदा पर मैंने उसे बाहों में जकड लिया और चूमने लगा पर वेह छूट कर कड़ी हो गयी और खिलखिला उठी “ अभी नहीं बाबूजी, बड़े आये अब चूमा छाती करने वाले. इतने दिन तो कैसे मिटटी के माधो बने घुमते थे अब चले आये चिपकने. चलो जाने दो मुझको”

कपडे ठीक करके वेह कमरे के बहार चली गयी. जाते जाते मेरे चेहरे की निराशा देखकर बोली, “ ऐसे मुंह मत लटकाओ मेरे राजा बाबु मैं आउंगी फिर अभी कोई आ जाएगा तो? अब जरा सबर करो मैं रात को आउंगी. देखना कैसी सेवा करूंगी अपने राजकुमार जैसे बाबूजी की. अब मुट्ठ नहीं मारना आपको मेरी कसम!”

मैं तिरुपत होकर लुडक गया और मेरी आँख लग गयी. विश्वास नहीं हो रहा था की इस मतवाली औरत ने अभी अभी मेरा लैंड चूसा है. सीधा शाम को उठा. मन में ख़ुशी के लड्डू फूंत रहे थे. क्या औरत थी! इतना मस्त लैंड चूसने वाली और एकदम तीखी कटारी. कमरे के बाहर जाकर देखा तो मंजू गायब थी. अच्चा हुआ क्योंकि जिस मूड में मैं था उसमें उसे पकड़कर जरूर उसे जबरदस्ती छोड़ डालता. टाइम पास करने को मैं क्लब में चला गया.

जब रात को नौ बजे वापस आया तो खाना टेबल पर रखा था. मंजू अब भी गायब थी. मैं समझ गया की वो अब सीधे सों एके समय ही आएगी. आखिर उसे भी एहसास होगा की कोई रात को उसे मेरे घर में देख ना ले. दिन की बात और थी. वैसे घर की चाभी उसके पास थी ही. मैं जाकर नहाया और फिर खाना खाकर अपने कमरे में आ गया. अपने सारे कपडे निकाल दिए और अपने खड़े लैंड को पुचकारता हुआ मंजू का इंतज़ार करने लगा.


दस बजे दरवाजा खोल कर मंजू बाई अन्दर आई. तब तक मेरा लैंड सूज कर सोंटा बन गया था. बहुत मीठी तकलीफ दे रहा था. मंजू को देखकर मेरा लैंड और जयादा थिरक उठा. उसकी हिम्मत की मैंने मन ही मन दाद दी. मैं यह भी समझ गया की उसे भी तेज़ चुदासी सता रही होगी!

मंजू बाई बाहर के कमरे में अपने सारे कपडे उतार कर आई थी एकदम मादरजात नंगी. पहली बार उसका नगन मादक असली देसी रूप मैंने देखा. सांवली छरहरी काय, छोटे सेब जैसी ठूस चूचियां, बस जरा सी लटकी हुई, स्लिम पर मजबूत झांघे और घनी झांटों से भरी बुर, मैं तो पगला सा गया. उसके शरीर पर कहीं भी चर्बी का जरा सा काटना नहीं था, बस एकदम कड़क दुबला पतला शरीर था.

वो मेरी और बिना झिझके देख रही थी पर मैं थोडा शर्मा गया था. पहली बार किसी औरत के सामने मैं नंगा हुआ था और किसी औरत को पूरा नंगा देख रहा था. और वेह आखिर उम्र में मुझसे कफ्ही बड़ी थी, करीब मेरी मौसी की उम्र की. पर वेह बड़ी सह्झता से चलती हुई मेरे पास आकार बैठ गयी. मेरा लैंड हाथ में पकड़ कर बोली,”वाह बाबूजी, क्या खड़ा है? मेरी याद आ रही थी? ये मंजू बाई पसंद आ गयी है लगता है आपके लौड़े को.”

अब मुझसे रहा नहीं गया. उसे बांहों में भींच कर मैं उसको चूमने लगा. उसके होंठ भी थोड़े खुरदरे थे पर एकदम मीठे, उनमें से पान की भीनी खुशबू आ रही थी. वेह भी अपनी बाहें मेरे गले में दाल कर इतराती हुई मेरे चुम्बनों का उत्तर देने लगी, अपनी जीभ उसने मेरे मुंह में दाल दी और मैं उसे चूसने में लग गया. बड़ा मादक चुम्बन था,उस नौकरानी का मुंह इतना मीठा होगा, मैंने सपने में सोचा भी नहीं था. मेरा लैंड अब ऐसा फनफना रहा था की मैं अब उसे पटक कर उसपर चड़ने की कोशिश करने लगा.

“अरे क्या भूखे भेडिये जैसे कर रहे हो बाबूजी, जरा मज़ा लो, धीरे धीरे मस्ती करो. आप आराम से लेटो,मैं करूंगी जो करना है” कहकर उसने मुझे पलंग पर धकेल दिया. मुझे लिटाकर वेह फिर मेरा लैंड चूसने लगी. मुझे मज़ा आ रहा था पर उसे कास के छोड़ने की इच्चा मुझे शांत नहीं लेटने दे रही थी.

“मंजू बाई चलो अब चुदवा भी लो, ऐसे ना सताओ. देखो, फिर चूस कर नहीं झादाना, आज मैं तुझे खूब चोदुंगा.” मैंने उसकी एक चुन्ची हाथ में लेकर कहा. उसका कदा निप्प्ले कंचे जैसा मेरी हथेली में चुभ रहा था.

उसने हंस कर मुंडी हिलाई की समझ गयी पर मेरे लैंड को उसने नहीं छोड़ा, और जयादा मुंह मैं लेकर चूसती ही रही. शायद फिर से मेरी मलाई के पीचे थी वो बिल्ली! मैं तैश में आ गया, उठ कर उसके मुंह से जबरदस्ती बाहर खींचा और उसे बिस्तर पर पटक दिया.

वेह कहती रह गयी, “ अरे रुको बाबूजी, ऐसे नहीं” पर मैंने उसकी टाँगे अलग करके अपना लैंड उसकी चूत पर रखा और पेल दिया. बुर इतनी गीली थी की लैंड आराम से अन्दर चला गया. मैं अब रुक्न्र की इस्थिति में नहीं था, एक झटके से मैंने लैंड जड़ तक उसकी चूत मैं उतार दिया और फिर उस के उप्पेर लेट कर उसे छोड़ने लगा.

मंजू हँसते हुए मुझे दूर करने की कोशिश करने लगी, “ बाबूजी रुको, ऐसे नहीं छोड़ो, जरा मजा करके छोड़ो, मैं कहाँ भागी जा रही हूँ? अरे धीरे बाबूजी, ऐसे जानवर जैसे ना धक्के मारो! जरा हौले हौले प्यार करो मेरी बुर को” मैंने उसके मुंह को अपने होंठों में दबा लिया और उसकी बकबक बंद कर दी. फिर उसे भींच कर कास के हचक हचक कर उसे छोड़ने लगा. उसकी चूत इतनी गीली थी की मेरा लैंड गपागप अन्दर बाहर हो रहा था. कुछ देर और छूटने की कोशिश करने के बाद मंजू बाई ने हार मान ली और मुझसे चीपट कर अपने चुतद उछाल उछाल कर चुदवाने लगी. अपने पैर उसने मेरी कमर के इर्द गिर्द कास रखे थे और अपनी बांहों में मुझे भींच लिया था.

इतना आनंद हो सकता है चुदाई में मैंने सोचा भी नहीं था. मंजू का मुंह चूसते हुए मैंने उसकी चूत की कुटाई चालु रखी. यह सुच कभी समाप्त ना हो ऐसा मुझे लग रहा था. पर मैंने बहुत जल्दी कित ही. मंजू बाई की उस मादक देसी काय और उसकी गरमागरम चिपचिपी चूत ने मुझे ऐसा बहकाया की मैं दो मिनट में ही झड गया. पड़ा पड़ा मैं इस सुच में डूबा मज़ा लेता रहा. मंजू बाई बेचारी अब भी गरम थी और निचे से अपनी चूत को उप्पेर निचे कर के चुदने की कोशिश कर रही थी.

मुझे अब थोड़ी शर्म आई की बिना मंजू को झादाये मैं झड गया. “ मांफ करना मंजू बाई, तुमको झादाने के पहले ही मैं बहक गया.”


मुझे अब थोड़ी शर्म आई की बिना मंजू को झादाये मैं झड गया. “ मांफ करना मंजू बाई, तुमको झादाने के पहले ही मैं बहक गया.”

मेरी हालत देखकर मंजू बायीं मुझसे चिपटकर मुझे चुनते हुए बोली "कोई बात नहीं मेरे राजा बाबु. आप जैसा गरम नौजवान ऐसे नहीं बहकेगा तो कौन बहकेगा. और मेरे बदन को देख कर ही आप ऐसे मस्त हुए हो ना? मैं तो निहाल हो गयी की मेरे बाबूजी को ये गाँव की औरत इतनी अच्छी लगी. आप मुझसे कितने छोटे हो, पर फिर भी आप को मैं भा गयी, पिछले जनम में मैंने जरुर अच्छे कर्म किये होंगे. चलो, अब भूख मिट गयी ना? अब तो मेरा कहना मानो. आराम से पड़े रहो और मुझे अपना काम करने दो."

मंजू के कहने पर मैंने अपना झाडा लैंड वैसे ही मंजू की चूत में रहने दिया और उसपर पड़ा रहा. मुझे बांहों में भरके चुनते हुए वेह मुझसे तरह तरह की उकसाने वाली बातें करने लगी "बाबूजी मज़ा आया? मेरी चूत कैसी लगी? मुलायम है ना? पर मखमल जैसी चिकनी है या रेशम जैसी? कुछ तो बोलो, शरमाओ नहीं!"

मैंने उसे चुन कर कह की दुनिया के किसी भी मखमल या रेशम से ज्यादा मुलायम है उसकी बुर. मेरी तारीफ़ पर वेह फूल उठी. आगे पटर पटर करने लगी. "पर मेरी झानतें तो नहीं चुभी आपके लैंड को? बहुत बढ़ गयी हैं और घुंघराली भी है, पर मैं क्या करूँ, काटने का मन नहीं होता मेरा. वैसे आप कहो तो काट दूँ. मुझे बड़ी झानतें अच्छी लगती है. और मेरा चुन्मा कैसा लगता है, बताओ ना? मीठा है की नहीं? मेरी जीभ कैसी है बताओ.

मैंने कह की जलेबी जैसी. मैं समझ गया था की वेह तारीफ़ की भूखी है. वेह मस्ती से बहक सी गयी. "कितना मीठा बोलते हो, जलेबी जैसी है ना? लो चूसो मेरी जलेबी" और मेरे गाल हाथों में लेकर मेरे मुंह में अपनी जीभ दाल दी. मैंने उसे दांतों के बीच पकड़ लिया और चूसने लगा. वेह हाथ पैर फेकने लगी. किसी तरह छूट कर बोली "अब देखो मैं तुमको कैसे छोडती हूँ. अब मेरे पल्ले पड़े हो, रोज इतना चोदूंगी तुमको की मेरी चूत के गुलाम हो जाओगे"

इन कामुक बातों का परिणाम यह हुआ की दस मिनट में मेरा फिर खड़ा हो गया और मंजू की चूत में अंदर घुस गया. मैंने फिर उसे चोदना शुरू कर दिया पर अब धीरे धीरे और प्यार से मजे ले लेकर. मंजू भी मजे ले लेकर चुदवाती रही पर बीच में अचानक उसने पलटकर मुझे नीचे पटक दिया और मेरे उपर आ गयी. उपर से उसने मुझे चोदना चालु रखा.

"अब चुपचाप पड़े रहो बाबूजी. आजकी बाकी चुदाई मुझपर छोड़ दो." उसका यह हुक्म मान कर मैं चुपचाप लेट गया. वेह उठाकर मेरे पेट पर बैठ गयी. मेरा लैंड अब भी उसकी चूत में अंदर तक घुसा हुआ था. वेह आराम से घुटने मोड़ कर बैठ गयी और उपर नीचे होकर मुझे छोड़ने लगी. उपर नीचे होते समय उसके मम्मे उछल रहे थे. मैंने हाथ बढ़ाकर उन्हें पकड़ लिया और दबाने लगा. उसकी गीली चूत बड़ी आसानी से मेरे लैंड पर फिसल रही थी. उस मखमली म्यान ने मेरे लैंड को ऐसा कदा कर दिया जैसे लोहे का डंडा हो.

मंजू मन लगाकर मजा ले लेकर मुझे हौले हौले छोड़ रही थी. चूत से पानी की धार बह रही थी जिससे मेरा पेट गिला हो गया था. मैंने अपना पूरा जोर लगाकर अपने आप को झाड़ने से रोका और कमर उपर नीचे करके नीचे से ही मंजू की बुर में लैंड पलता रहा.

आखिर मंजू बायीं एक हलकी सिसकी के साथ झड ही गयी. उसकी आँखों में झलक आई तृप्ति को देखकर मुझे रोमाच हो आया. आखिर मेरे लैंड ने पहली बार किसी औरत को इतना सुख दिया था. झड कर भी वेह रुकी नहीं, मुझे चोदती रही "पड़े रहो बाबूजी, अभी थोड़े छोदुंगी तुमको, घंटा भर चोदूंगी, बहुत दिन बाद लैंड मिला है और वो भी ऐसा शाही लौदा. और देखो मैं कहूँ तब तक झाड़ना नहीं, नहीं तो मैं आपकी नौकरी छोड़ दूंगी"

एस मीठी धमकी के बाद मेरी क्या मजाल थी झाड़ने की. घंटे भर तो नहीं, पर बीस एक मिनट मंजू बायीं ने मुझे खूब चोदा, अपनी सारी हवास पूरी कर ली. चोदने में वेह बड़ी उस्ताद निकली, मुझे बराबर मीठी छुरी से हलाल करती रही, अगर मैं झाड़ने के करीब आता तो रुक जाती. मुझे और मस्त करने को वेह बिच बिच में खुद ही अपनी चुंचियां मसलने लगती. कहती "चूसोगे बाबूजी?" और खुद ही झुक कर अपनी चूंची खिंच कर निप्पल चूसने लगाती. मैं उठकर उसकी चूंची मुंह में लेने की कोशिश करता तो हंस कर मुझे वापस पलंग पर धकेल देती. तरसा रही थी मुझे!

दो बार झाड़ने के बाद वेह मुझ पर तरस खाकर रुकी. अब मैं वासना से तड़प रहा था. मुझसे सांस भी नहीं ली जा रही थी.

"चलो पीछे खिसक कर सिरहाने से टिक कर बैठ जाओ बाबूजी, तुम बड़े अच्छे सैयां हो, मेरी बात मानते हो, अब इनाम दूंगी" मैं सरका और टिक कर बैठ गया. अब वेह मेरी और मुंह करके मेरी गोद में बैठी थी. मेरा उछलता लैंड अब भी उसकी चूत में कैद था. वेह उपर होने के कारण उसकी छाती मेरे मुंह के सामने थी. पास से उसके सेब से मम्मे देखकर मज़ा आ गया. किशमिश के दानो जैसे छोटे निप्पल थे उसके और तन कर खड़े थे. मंजू मेरे से लाड करते हुए बोली "मुंह खोलो बाबूजी, अपनी मंजू अम्मा का दूध पियो. दूध है तो नहीं मेरी चूंची में, झूट मूत का ही पियो, मुझे मजा आता है"

मेरे मुंह में एक घुंडी देकर उसने मेरे सिर को अपनी छाती पर भींच लिया और मुझे जोर जोर से चोदने लगी. उसका आधा मम्मा मेरे मुंह में समां गया था. उसे चूसते हुए मैंने भी निचे से उचक उचक कर चोदना शुरू कर दिया, बहुत देर का मैं इस छुरी की धार पर था, जल्द ही झड गया.

पडा पडा मैं इस मस्त स्खलन का लुत्फ़ लेने लगा.

मंजू उठी और मुझे प्यार भरा एक चुन्मा देकर जाने लगी. उसकी आँखों में असीम प्यार और तृप्ति की भावना थी. मैं उसका हाथ पकड़कर बोला. "अब कहां जाती हो मंजू बायीं, यहीं सो जाओ मेरे पास, अभी तो रात बाकी है"

वेह हाथ छुड़ा कर बोली "नहीं बाबूजी, मैं कोई आपकी लुगाई थोड़े ही हूँ, कोई देख लेगा तो आफत हो जायेगी. कुछ दिन देखूंगी. अगर किसी को पता नहीं चला तो आप के साथ रात भर सोया करुँगी"

मुझे पक्का यकीं था की इस कालोनी में जहाँ दिन में भी कोई नहीं होता था, रात को कोई देखने वाला कहां होगा!. और उसका घर भी तो भी मेरे बंगले से लगा हुआ था. पर वेह थोड़ी घबरा रही थी इसीलिए अभी मैंने उसे जाने दिया.

दुसरे दिन से मेरा कामजीवन ऐसे निखर गया जैसे खुद भगवान् कामदेव की मुझ पर कृपा हो. मंजू सुबह सुबह चाय बनाकर मेरे बेडरूम में लाती और मुझे जगाती. जब तक मैं चाय पिता, वेह मेरा लैंड चूस लेती. मेरा लैंड सुबह तन कर खड़ा रहता था और झड कर मुझे बहुत अच्चा लगता था. फिर नहा धोकर नाश्ता करके मैं ऑफिस को चला जाता.

दोपहर को जब मैं घर आता तो मंजू एकदम तैयार रहती थी. उसे बेडरूम में ले जाकर मैं फटाफट दस मिनट में छोड़ डालता. वेह भी ऐसी गरम रहती थी की तुरंत झड जाती थी. इस जल्दबाजी की चुदाई का आनंद ही कुछ और था. अब मुझे पता चला की 'क्विकी' किस चीज़ का नाम है. चुदने के बाद वेह मुझे खुद अपने हाथों से प्यार से खाना खिलाती, एक बच्छे जैसे. मैं फिर ऑफिस को निकल जाता.

शाम को हूँ जरा सावधानी बरतते थे. मुझे क्लब जाना पड़ता था. कोई मिलने भी अक्सर घर आ जाता था. इसलिए शाम को मंजू बस कितचन में ही रहती या बाहर चली जाती. पर रात को ऐसी धुआन्धार चुदाई होती की दिन की सारी कसार पूरी हो जाती. सोने को तो बार बज जाते. अब वेह मेरे साथ ही सोती थी. एक हफ्ता हो गया था और रात को माहौल इतना सुनसान होता था की किसी को कुछ पता चलने का सवाल ही नहीं था. वीकेंड में शुक्रवार और शनिवार रात तो मैं उसे रात भर चोदता, तीन चार बज जाते सोने को.

मैंने उसकी तंखुवा भी बाधा दी थी. अब मैं उसे हजार रुपये तंखुवा देता था. पहले वेह नहीं मान रही थी. जरा नाराज होकर बोली "ये मैं पैसे को थोड़ी करती हूँ बाबूजी, तुम मुझे अच्छे लगते हो इसीलिए करती हूँ." पर मैंने जबरदस्ती की तो मान गयी. इसके बाद वेह बहुत खुश रहती थी. मुझे लगता है की उसकी वेह ख़ुशी पैसे के कारण नहीं बल्कि इसलिए थी की उसे चोदने को मेरे जैसा नौजवान मिल गया था, करीब करीब उसके बेटे की उम्र का.

मंजू को मैं कई आसनों में चोदता था पर उसकी पसंद का आसन था मुझे कुर्सी में बिठाकर मेरे उपर बैठ कर अपनी चूंची मुझसे चुसवाते हुए मुझे चोदना. मुझे कुर्सी में बिठाकर वेह मेरा लैंड अपनी चूत में लेकर मेरी और मुंह करके मेरी गोद में बैठ जाती. फिर मेरे गले में बान्हे दाल कर मुझे अपनी छाती से चिपटाकर चोदती. उसकी चूंची मैं इस आसन में आराम से चूस सकता था और वेह भी मुझे उपर से मन चाहे जितनी देर छोड़ सकती थी क्योंकि मेरा झाडना उसके हाथ में था. उसके कड़े निप्प्ले मुंह में लेकर मैं मदहोश हो जाता.

शनिवार रविवार को बहुत मजा आता था. मेरी छूटती होने से मैं घर में ही रहता था इसलिए मौक़ा देखकर कभी भी उससे चिपट जाता था और खूब चूमता और उसके मम्मे दबाता. जब वेह कित्चें में खाना बनाती थी तो उसके पीछे खड़े होकर मैं उससे चिपट कर उसके मम्मे दबाता हुआ उसकी गर्दन और कंधे चूमता.

उसे इससे गुदगुदी होती थी और वेह खूब हंसती और मुझे दूर करने की झूठी कोशिश करती "हटो बाबूजी, क्या लपर लपर कर रहे हो कुत्तों जैसे, मुझे अपना काम करने दो" तब मैं उसके मुंह को अपने मुंह से बंद कर देता. मेरा लैंड उसके साडी के उपर से ही चूतादों के बिच की खाई में समां जाता और उसे उसकी गांड पर रगड़ रगड़ कर मैं खूब मज़ा लेता. कभी मौका मिलता तो दिन में ही बेडरूम में ले जाकर फटाफट छोड़ डालता था.

धीरे धीरे मेरे दिमाग में उसके उन मस्त छूतादों को छोड़ने का ख़याल आने लगा. उसके छूताद थे तो छोटे पर एकदम गोल और कड़े थे. छोड़ते समय मैं कई बार उन्हें पकड़ कर दबाता था. इसपर वेह कुछ नहीं कहती थी पर एकाध बार जब मैंने उसकी गांड में उंगली करने की कोशिश की तो बिचक गयी. उसे वेह अच्चा नहीं लगता था.

कब उसकी गांड मारने को मिलती है इस विचार से मैं पागल सा हो जाता. वेह चुड़ैल औरत भी शायद जानती थी की मैं कैसे उसकी गांड को ललचाकर देखता था. इसीलिए मेरे सामने जान बुझकर वेह मटक मटक कर छूताद हिलाकर चलती थी. लगता था की अभी पटक कर उस चिनाल के छूतादों के बिच अपना लौदा गाद दूं.

एक दिन मैंने साहस करके उससे कह ही डाला "मंजू बायीं, अपने इस सैयां को कभी पीछे के दरवाजे से भी अपने घर में आने दो, सामने से तुम्हारे घर में घुसाने में बहुत मज़ा आता है पर पीछे के दरवाजे से आने में बात ही और कुछ है"

वेह हंस कर ताल गयी "वा बाबूजी, बड़े शैतान हो, सीधे क्यों नहीं कहते की मेरी गांड मारना चाहते हो. बोलो, यही बात है ना?" मैंने जब थोड़ा सकुचा कर हामी भरी तो तुनक कर बोली "मैं क्यों अपनी गांड मरावाउन, मेरा क्या फायदा उसमी? और दर्द होगा वो अलग!"

वो पैसे के फायदे के बारे में नहीं कह रही थी क्योंकि जब मैंने एक बार हिचकते हिचकते उसकी तंखुवा बाधा देने की बात की तो बेहद नाराज हो गयी. दो दिन मुझे हाथ भी नहीं लगाने दिया. "मुझे रंडी समझा है क्या बाबूजी? की पैसे देकर गांड मार लोगे?" गुस्से से बोली. उसे समझाने बुझाने में मुझे पूरे दो दिन लग गए. बिलकुल रूठी हुई प्रेमिका जैसे उस मनाना पड़ा तब उसका गुस्सा उतरा.

मुझे समझ में नहीं आता था की कैसे उसे मानों गांड मारने देने को. एक बार मैंने बहुत मिन्नत की तो बोली "तुम्हारा इतना मन है तो देखती हूँ बाबूजी, कोई रास्ता निकलता है क्या. पर बड़े अपने आप को मेरा सैयां कहते हो! मुझे कितना प्यार करते हो ये तो दिखाओ. मेरी ये रसीली चूत कितनी अच्छी लगाती है तुम्हे ये साबित करो. मुझे खुश करो मेरे राजा बाबू तो मैं शायद मारने दूँगी अपनी गांड तुमको. मेरे सैयां के लिए मैं कुछ भी कर लुंगी, पर मेरा सच्चा सैयां बन कर तो दिखाओ" पर यह नहीं बोलती थी की मैं कैसे उसे खुश करूँ. मैं चोदता तो था उसे मन भर के, उसकी इच्छा के अनुसार. पर वो और कुछ खुलासा नहीं करती थी की उसके मन में क्या है.

एक रात मैं मंजू को गोद में बिठाकर उसे चुमते हुए एक हाथ से उसके मम्मे मसल रहा था और एक हाथ से उसकी घनी झांटों में उंगली दाल कर उसकी बुर सहला रहा था. ऐसा मैं अक्सर करता था, बड़ा मज़ा आता था, मंजू के मीठे मीठे चुम्मे, उसका कड़क बदन मेरी बांहों में और उंगली उसकी घुंघराले घने बालों से भरी बुर में.

उस दिन मैं उसकी चूत में उंगली डालकर उसे हस्तमैथुन करा रहा था. मैंने उसे सहज पूछा था की जब मेरा लैंड नहीं था तो कैसे अपनी चुदासी दूर करती थी तो हंस कर बोली "ये हाथ किस लिए है बाबूजी?" फिर मेरे आग्रह पर उसने मेरी गोद में बैठे बैठे ही अपनी उंगली से अपनी मुथ्थ मार कर दिखाई.

सामने के आईने में मुझे साफ़ दिख रहा था, मंजू अंगूठे और एक उंगली से अपनी झंन्तें बाजू में करके बिच की उंगली बड़े प्यार से अपनी बुर की लकीर में चला कर अपना क्लिटोरिस रगड़ रही थी और बिच बिच में वेह उस उंगली को अंदर घुसेड कर अंदर बाहर करने लगाती थी. उसका हस्तमैथुन देख कर मैं ऐसा गरम हुआ की तभी उसे छोड़ डालना चाहता था. पर उसने जिद पकड़ ली की अब मैं उसकी मुत्थ मारून. मैंने अपनी उंगली उसकी बुर में दाल दी. वेह मुझे सिखाने लगी की कैसे औरत की चूत को उंगली से चोदा जाता है.

जब वेह झड गयी तो मैंने उंगली बाहर निकाली. उस पर सफ़ेद चिपचिपा रस लगा था. मैंने सहज ही उसे नाक के पास ले जाकर सुंघा. बहुत मादक सुगंध थी. मेरी यह हरकत देखकर वेह इतर कर बोली "सिर्फ सुन्घोगे बाबूजी, चखोगे नहीं? बहुत मज़ा आएगा, असली देसी घी निकलता है मेरी चूत से मेरे राजा. “खोबा है खोबा!" उसकी चमकती आँखों में एक अजीब कामुकता थी.

अचानक मेरे दिमाग में बिजली सी कौंध गयी की वेह मुझसे क्या चाहती है.


अचानक मेरे दिमाग में बिजली सी कौंध गयी की वेह मुझसे क्या चाहती है. इतने दिनों की चुदाई में वेह बेचारी रोज मेरा लैंड चुस्ती थी, मेरा वीर्य पीती थी पर मैंने एक दिन भी उसकी चूत को मुंह नहीं लगाया था. वैसे उसकी रिसती लाल चूत देखकर कई बार मेरे मन में ये बात आई थी पर मन नहीं मानता था. थोड़ी घिन लगती थी की इस नौकरानी की चूत ठीक से साफ़ की हुई होगी की नहीं. वैसे वेह बेचारी दिन में दो बार नहाती थी पर फिर भी मैंने कभी उसकी चूत में मुंह नहीं डाला था. आज उसकी उस रिसती बुर को देखकर मैंने निश्चय कर लिया की चूस कर देखूंगा, खूब चातुन्गा की कैसा है यह सफ़ेद शहद.

मेरा लैंड तन कर खड़ा था, उसके जोश में मैंने उसकी और देखकर अपना मुंह खोला और अपनी उंगली मुंह में लेकर चूसने लगा. मेरी सारी हिचक दूर हो गयी. बहुत मस्त खारा सा स्वाद था. मंजू मेरी गोद में बिलकुल चुप बैठी मेरी और देख रही थी. उसकी सांस अब तेज चल रही थी. एक अनकही वासना उसकी आँखों में उमड़ आई थी. मैं उंगली जीभ से साफ़ करके बोला "मंजू बायीं, तेरी बुर में तो लगता है खजाना है शहद का. चलो चात्वाओ, टांगें खोलो और लेट जाओ. मैं भी तो चूत चाट कर देखूं की कितना रस निकलता है तेरी चूत में से"

यह सुनकर वेह कुछ देर ऐसे ही बैठी रही जैसे मेरी बात पर उसे यकीं नहीं हो रहा हो. फिर जब उसने समझ लिया की मैं पुरे दिल से यह बात कह रहा हूँ तो बिना कुछ कहे मेरी गोद से वेह उठ कर बाहर चली गयी. मुझे समझ में नहीं आया की इसे क्या हुआ. दो मिनट बाद वापस आई तो हाथ में नारियल के तेल की शीशी लेकर.

मैंने पुचा "अरे ये क्यों ले आई हो मंजू रानी, छोड़ने में तो इसकी जरुरत नहीं पड़ती, तेरी चूत तो वैसे ही गीली रहती है हरदम" तो शीशी सिरहाने रखकर बोली "अगर आज आपने मुझे खुश कर दिया बाबूजी तो मेरी गांड आपके लिए नजराने मैं पेश है. मार लेना जैसे चाहे. इसीलिए तेल ले आई हूँ, बिना तेल के आपका यह मुस्तंदा अंदर नहीं जायेगा, मेरी गांड बिलकुल कुंवारी है बाबूजी, फट जायेगी, जरा रहम करके मारना"




उसकी कोरी गांड मारने के ख़याल से मेरा लैंड उछलने लगा. मैंने उसे कुर्सी में बिठाया और उसकी टांगें उठाकर कुर्सी के हाथों में फंसा दिन. अब उसकी टांगें पूरी फैली हुई थीं और बुर एकदम खुली हुई थी. मैंने उसके सामने निचे जमीं पर बैठ कर उसकी जाँघों को चूमा. मंजू अब मस्ती में पागल सी हो गयी थी. उसने खुद ही अपनी उंगली से अपनी झंन्तें बाजू में की और दुसरे हाथ की उंगली से चूत के पपोटे खोल कर लाल लाल गिला छेद मुझे दिकाया. "चूस लो मेरे राजा मेरे जन्नत के इस दरवाजे को, चाट लो मेरा माल मेरे राजा, मान कसम, बहुत मसालेदार राज है मेरी, आप चाटोगे तो फिर और कुछ नहीं भायेगा. मैं तो कब से सपना देख रही हूँ अपने सैयां को अपना ये अमृत चखाने का, पर आपने मौक़ा ही नहीं दिया"

मैं जीभ निकलकर उसकी चूत पर धीरे धीरे फिराने लगा. उस चिपचिपे पानी का स्वाद कुछ ऐसा मादक था की मैं कुत्ते जैसी पूरी जीभ निकालकर उसकी बुर को उपर से निचे तक चाटने लगा. उसके घुंघराले बाल मेरी जीभ में लग रहे थे. चूत के उपर के कोने में जरा सा लाल लाल कदा हीरे जैसा उसका चलित था. उस पर से मेरी जीभ जाती तो वेह किलकने लगाती.

उसका रस ठीक से पिने के लिए मैंने अपने मुंह में उसकी चूत भर ली और आम जैसा चूसने लगा. चम्मच चम्मच रस मेरे मुंह में आने लगा. "हाय बाबूजी, कितना मस्त चूसते हो मेरी चूत, आज मैं सब पा गयी मेरे राजा, कब से मैंने मन्नत मांगी थी की आप को मेरे बुर का माल पिलाऊं, मैं जानती थी की आप पसंद करोगे" करहाते हुए वेह बोली. अब वेह अपनी कमर हिला हिला कर आगे पीछे होते हुई मेरे मुंह से अपने आप को चुदवाने की कोशिश कर रही थी. अचानक वेह झड़ी और अगले दो तिन मिनट मैं घूंट घूंट वेह शहद पिटा रहा.

"बायीं, सच में तेरी चूत का पानी बड़ा जायकेदार है, एकदम शहद है, फ़ालतू मैं मैंने इतने दिन गंवाए" मैंने जीभ से चटखारे लेते हुए कह. "तो क्या हुआ बाबूजी, अब से रोज पिया करो, अब तो मैं सुबह शाम, दिन रात आपको पेट भर कर अपना शहद चत्वाउन्गि." मंजू मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाकर बोली.

मैं चूत चाटता ही रहा. उसे तिन बार और झादाया. वेह भी मस्ती में मेरे सिर को कास कर अपनी बुर पर दबाये मेरे मुंह पर धक्के लगाती रही. झड झड कर वो थक गयी पर मैं नहीं रुका. वो पूरी लास्ट होकर कुरसी में पीछे लुधक गयी थी. अब जब भी मेरी जीभ उसके चलित पर जाती, तो उसका बदन कांप उठता. उसे सहन नहीं हो रहा था.

"छोडो अब बाबूजी, मार डालोगे क्या? मेरी बुर दुखने लगी है, तुमने तो उसे निचोड़ डाला है, अब किरपा करो मुझपर, छोड़ दो मुझे, पाँव पड़ती हूँ तुम्हारे" वो मेरे सिर को हटाने की कोशिश करते हुए बोली.

मैंने उसके हाथ पकड़ कर अपने सिर से अलग किये और उसकी चूत को और जोर से चाटने और चूसने लगा. उसके चलित को मैं अब जीभ से रेती की तरह घिस रहा था. उसके तड़पने में मुझे मज़ा आ रहा था. वो अब सिसक सिसक कर इधर उधर हाथ पैर फेंक कर तड़प रही थी. जब आखिर वो रोने लगी तब मैंने उसे छोड़ा. उठ कर उसे खिंच कर उठता हुआ बोला "चलो बायीं, तेरा शहद लगता है ख़तम हो गया है. अब गांड मराने को तैयार हो जाओ. कैसे मराओगी, खड़े खड़े या लेट कर?"

वेह बेचारी झड झड कर इतनी थक गयी थी की उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. उसकी हालत देख कर मैंने उसे बांहों में उठाया और उसके मस्त शारीर को पट पलंग पर पटक कर उस पर चढ़ बैठा.

मैंने जल्दी जल्दी अपना लैंड तेल से चिकना किया और फिर उसकी गांड में तेल लगाने लगा. एकदम संकरा और छोटा छेड़ था, वो सच बोल रही थी की अब तक उसकी गांड में कभी किसी ने लैंड नहीं डाला था. मैंने पहले एक और फिर दो उंगली दाल दी. वो दर्द से सिसक उठी. "धीरे बाबूजी, दुखता है ना, दया करो थोड़ी अपनी इस नौकरानी पर, हौले हौले उंगली करो"

मैं तैश में था. सीधा उसकी गांड का छेड़ दो उँगलियों से खोल कर बोतल लगायी और चार पांच चम्मच तेल अंदर भर दिया. फिर दो उंगली अंदर बाहर करने लगा "चुप रहो बायीं, चूत चुसवा कर मज़ा किया ना, अब जब मैं लैंड से गांड फादुन्गा तो देखना कितना मज़ा आता है. तेरी चूत के रस ने मेरे लैंड को मस्त किया है, अब उसकी मस्ती तेरी गांड से ही उतरेगी".

मंजू सिसकते हुए बोली पर उसकी आवाज में प्यार और समर्पण उमड़ पद रहा था "बाबूजी, गांड मार लो, मैंने तो खुद आपको ये चढ़ावे में दे दी है, आपने मुझे इतना सुख दिया है मेरी चूत चूस कर, ये अब आपकी है, जैसे चाहो मज़ा कर लो, बस जरा धीरे मारो मेरे राजा"

अब तक मेरा लैंड भी पूरा फनफना गया था. उठ कर मैं मंजू की कमर के दोनों और घुटने टेक कर बैठा और गुदा पर सुपादा जमा कर अंदर पेल दिया. उसके संकरे छेड़ में जाने में तकलीफ हो रही थी इसीलिए मैंने हाथों से पकड़ कर उसके छूताद फैलाए और फिर कास कर सुपादा अंदर दाल दिया. पक्क से वेह अंदर गया और मंजू दबी आवाज में "उई मान, मर गयी रे" चीख कर थरथराने लगी. पर बेचारी ऐसा नहीं बोली की बाबूजी गांड नहीं मर्वौंगी. मुझे रोकने की भी उसने कोई कोशिश नहीं की.

मैं रुक गया. ऐसा लग रहा था जैसे सुपाडे को किसी ने कास के मुठ्ठी में पकड़ा हो. थोड़ी देर बाद मैंने फिर पेलना शुरू किया. इंच इंच कर के लैंड मंजू बायीं की गांड में धंसता गया. जब बहुत दुखता तो बेचारी सिसक कर हल्के से चीख देती और मैं रुक जाता.

आखिर जब जड़ तक लैंड अंदर गया तो मैंने उसके कुल्हे पकड़ लिए और लैंड धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगा. उसकी गांड का छल्ला मेरे लैंड की जड़ को कास कर पकड़ा था, जैसे किसीने अंगूठी पहना दी हो. उसके कुल्हे पकड़ कर मैंने उसकी गांड मारना शुरू कर दी. पहले धीरे धीरे मारी. गांड में इतना तेल था की लैंड मस्त फच फच करता हुआ सटक रहा था. वेह अब लगातार करह रही थी. जब उसका सिसकना थोडा कम हुआ तो मैंने उसके बदन को बाहों में भींच लिया और उस पर लेट कर उसके मम्मे पकड़ कर दबाते हुए कास के उसकी गांड मारने लगा.

मैंने उस रात बिना किसी रहम के मंजू की गांड मारी, ऐसे मारी जैसे रंडी को पैसे देकर रात भर को ख़रीदा हो और फिर उसे कूट कर पैसा वसूल कर रहा हूँ. मैं इतना उत्तेजित था की अगर वेह रोकने की कोशिश करती तो उसका मुंह बंद करके जबरदस्ती उसकी मारता. उसकी चुंचियां भी मैं बेरहमी से मसल रहा था, जैसे आम का रस निकालने को पिलपिला करते है. पर वेह बेचारी सब सह रही थी. आखिर में तो मैंने ऐसे धक्के लगाये की वेह दर्द से बिलबिलाने लगी. मैं झड कर उसके बदन पर लास्ट सो गया. क्या मज़ा आया था. ऐसा लगता था की अभी अभी किसी का बलात्कार किया हो.

जब लैंड उसकी गांड से निकाल कर उसे पलता तो बेचारी की आँखों में दर्द से आंसू आ गए थे, बहुत दुख था उसे पर वेह बोली कुछ नहीं क्योंकि उसीने खुद मुझे उसकी गांड मारने की इजाजत दी थी. उसका चुम्मा लेकर मैं बाजू में हुआ तो वेह उठकर बाथरूम चली गयी. उससे चला भी नहीं जा रहा था, पैर फैला कर लंगड़ा कर चल रही थी. जब वापस आई तो मैंने उसे बांहों में ले लिया. मुझसे लिपटे हुए बोली "बाबूजी, मज़ा आया? मेरी गांड कैसी थी?"

मैंने उस चूम कर कहा "मंजू बायीं, तेरी कोरी कोरी गांड तो लाजवाब है, आज तक कैसे बच गयी? वो भी तेरे जैसी चुड़ैल औरत की गांड ! लगता है मेरे ही नसीब में थी"

वो मजाक करते हुए बोली "मैंने बचा के रखी बाबूजी आप के लिए. मुझे मालुम था आप आओगे. अब आप कभी भी मेरी गांड मारो, मैं माना नहीं करुँगी. मेरी चूत में मुंह लगाकर आपने तो मुझे अपना गुलाम बना लिया. बस ऐसे ही मेरी चूत चूसा करो मेरे राजा बाबू, फिर चाहे जीतनी बार मारो मेरी गांड, पर बहुत दुखता है बाबूजी, आपका लैंड है की मुसल और आप ने आज गांड की धज्जियां उड़ा दिन, बहुत बेदर्दी से मारी है मेरी गांड! पर तुमको सौ खून मांफ है मेरे राजा, आखिर मेरे सैयां हो और मेरे सैयां को मेरे ये छूताद इतने भा गए, इसकी भी बड़ी ख़ुशी है मुझे"

उसकी इस अदा पर मैंने उस रात फिर उसकी बुर चूसी और फिर उसे मन भर के छोड़ा.
इसके बाद मैं उसकी गांड हफ्ते में दो बार मारने लगा, उससे ज्यादा नहीं, बेचारी को बहुत दुखता था. मैं भी मार मार कर उसकी कोरी टाईट गांड ढीली नहीं करना चाहता था. उसका दर्द कम करने को गांड में लैंड घुसेड़ने के बाद मैं उसे गोद में बिठा लेता और उसकी बुर को उंगली से छोड़कर उसे मज़ा देता, दो तिन बार उसे झादाकर फिर उसकी मारता. गांड मारने के बाद खूब उसकी बुर चूसता, उसे मज़ा देने को और उसका दर्द कम करने को.

वैसे उसकी चूत के पानी का चस्का मुझे ऐसा लगा, की जब मौका मिले, मैं उसकी चूत चूसने लगता. एक दो बार तो जब वेह खाना बना रही थी, या टेबल पर बैठ कर सब्जी काट रही थी, मैंने उसकी साडी उठाकर उसकी बुर चूस ली. उसको हर तरह से चोदने और चूसने की मुझे अब ऐसी आदत लग गयी थी की मैं सोचता था की मंजू नहीं होती तो मैं क्या करता.

यही सब सोचते मैं पड़ा था. मंजू ने अपने मम्मों पर हुए जख्मों पर तेल लगते हुए मुझे फिर उलहना दिया "क्यों चबाते हो मेरी चूंची बाबूजी ऐसे बेरहमी से. पिछले दो तिन दिन से ज्यादा ही काटने लगे हो मुझे"

मैंने उसकी बुर को सहलाते हुए कह "बायीं, अब तुम मुझे इतनी अच्छी लगती हो की तेरे बदन का सारा रस मैं पीना चाहता हूँ. तेरी चूत का अमृत तो बस तिन चार चम्मच निकलता है, मेरा पेट नहीं भरता. तेरी चुंचियां इतनी सुन्दर है, लगता है इनमे दूध होता तो पेट भर पि लेता. अब दूध नहीं निकलता तो जोश में काटने का मन होता है"

वेह हँसते हुए बोली "अब इस उम्र में कहां मुझे दूध छूटेगा बाबूजी. दूध छूटता है नौजवान छोकरियों को जो अभी अभी मान बनी है."

फिर वेह चुप हो गयी और कपडे पहनने लगी. कुछ सोच रही थी. अचानक मुझसे पूछ बैठी "बाबूजी, आप को सच में औरत का दूध पीना है या ऐसे ही मुफ्त बतिया रहे हो"

मैंने उसे भरोसा दिलाया की अगर उसके जैसे रसीली मतवाली औरत हो तो जरुर उसका दूध पिने में मुझे मज़ा आएगा.

"कोई इंतजाम करती हूँ बाबूजी. पर मुझे खुश रखा करो. और मेरी चुन्चियों को दांत से काटना बंद कर दो" उसने हुकुम दिया.

उसे खुश रखने को अब मैंने रोज उसकी बुर पूजा शुरू कर दी. जब मौका मिलता, उसकी चूत चाटने में लग जाता. मैंने एक वीसीआर भी खरीद लिया और उसे कुछ ब्लू फिल्म दिखें. तपे लगाकर मैं उसे सोफे में बिठा देता और खुद उसकी साडी उपर कर के उसकी बुर चूसने में लग जाता. एक घंटे की कैसेट ख़तम होते होते वेह मस्ती से पागल होने को आ जाती. मेरा सिर पकड़कर अपनी चूत पर दबा कर मेरे सिर को जाँघों में पकड़कर वेह फिल्म देखते हुए ऐसी झडती की एकाध घंटे किसी काम की नहीं रहती.

रात को कभी कभी मैं उसे अपने मुंह पर बिठा लेता. उछल उछल कर वो ऐसे मेरे मुंह और जीभ को छोडती की जैसे घोड़े की सवारी कर रही हो. कभी मैं उससे सिक्सटी नीने कर लेता और उसकी बुर चूस कर अपने लैंड की मलाई उसे खिलाता. मंजू बायीं मुझ पर बेहद खुश थी और मैं राह देख रहा था की कब वेह मुझ पर मेहरबान होती है.

एक इतवार को वेह सुबह ही गायब हो गयी.
सुबह से दोपहर हो गयी. फिर दोपहर से शाम फिर शाम से रात पर मंजू बाई का कुछ अत पता नहीं था की वो कहाँ गयी है और क्यों गयी है. मैं लेता लेता उसकी इंतज़ार करता करता सो गया.

रात की नींद के बाद मैं जब सुबह उठा तो मंजू वापस आ गयी थी. चाय लेकर कड़ी थी. मैंने उसकी कमर में हाथ दाल कर पास खिंचा और जोर से चूम लिया. "क्यों मंजू बायीं, कल से कहाँ गायब थी. मुझे कल सुबह से चम्मच भर शहद भी नहीं मिला. कहाँ गायब हो गयी थी?"

वेह मुझसे छुट कर मुझे आँख मारते हुए धीरे से बोली, "आप ही के काम से गयी थी बाबूजी. जरा देखो, क्या माल लायी हूँ तुम्हारे लिए!"

मैंने देखा तो दरवाजे में एक जवान लड़की कड़ी थी. थोड़ी शर्मा जरुर रही थी पर तक लगाकर मेरी और मंजू के बीच की चुम्मा छाती देख रही थी. मैंने मंजू को छोड़ा और उससे पूछा की ये कौन है. वैसे मंजू और उस लड़की की सूरत इतनी मिलती थी की मैं समझ गया की ये “कन्या” कौन है. मंजू ने भी पुष्टि की "बाबूजी, ये गीता है, मेरी बेटी. बीस साल की है, दो साल पहले शादी की है इसकी. अब एक बच्चा भी है"

मैं गीता को बड़े इंटेरेस्ट से घूर रहा था. मंजू बायीं उसे क्यों लायी थी यह भी मुझे थोडा थोडा समझ में आ रहा था. गीता मंजू जैसी ही सांवली थी पर उससे ज्यादा खूबसूरत थी. शायद उसकी जवानी की वजह से ऐसी लग रही थी. मंजू से थोड़ी नाती थी और उसका बदन भी मंजू से ज्यादा भरा पूरा था. एकदम मांसल और गोल मटोल, शायद मान बनने की वजह से होगा.

उस लड़की का कोई अंग एकदम मन में भरता था तो वेह था उसकी विशाल छाती. उसका आँचल ढला हुआ था; शायद उसने जान बुझकर भी गिराया हो. उसकी चोली इतनी तंग थी की छातियाँ उसमे से बाहर आने को कर रही थी. चोली के पतले कपडे में से उसके नारियल जैसे मम्मे और उनके सिरे पर जामुन जैसे निप्पलों का आकार दिख रहा था. निप्पलों पर उसकी चोली थोड़ी गीली भी थी.

मेरा लैंड खड़ा होने लगा. मुझे थोडा अटपटा लगा पर मैं क्या करता, उस छोकरी की मस्त जवानी थी ही ऐसी. मंजू आगे बोली. "उसे मैंने सब बता दिया है बाबूजी, इसीलिए आराम से रहो, कुछ छुपाने की जरुरत नहीं है"

मेरा लैंड अब तक तन्ना कर पूरा खड़ा हो गया था. मंजू हंसने लगी "मेरी बिटिया भा गयी बाबूजी आपको. कहो तो इसे भी यहीं रख लूं. आप की सेवा करेगी. हाँ इसकी तंखुवा अलग होगी"

उस मतवाली छोकरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था. "बिलकुल रख लो बायीं, और तंखुवा की चिंता मत करो"

"असल बात तो आप समझे ही नहीं बाबूजी, गीता पिछले साल ही मान बनी है. बहुत दूध आता है उसको, बड़ी तकलीफ भी होती है बेचारी को. बच्चा एक साल को हो गया, अब दूध नहीं पिता, पर इसका दूध बंद नहीं होता. चूंची सूज कर दुखने लगाती है. जब आप मेरा दूध पिने की बात बोले तो मुझे ख़याल आया, क्यों ना गीता को गाँव से बुला लाऊं, उसकी भी तकलीफ दूर हो जायेगी और आपके मन की बात भी हो जायेगी? बोलो, जमता है ना बाबूजी?"

मैंने गीता की चूंची घूरते हुए कहा "पर इसका मर्द और बच्चा?"

"उसकी फिकर आप मत करो, इसका आदमी काम से छेह महीने को शहर गया है, इसीलिए मैंने इसे मायके बुला लिया. इसकी सास अपने पोते के बिना नहीं रह सकती, बहुत लगाव है, इसीलिए उसे वहीँ छोड़ दिया है, ये अकेली है इधर"

याने मेरी लाइन एकदम क्लियर थी. मैं गीता का जोबन देखने लगा. लगता था की पकड़ कर खा जाऊं, चढ़ कर मसल डालूं उसके मतवाले रूप को. गीता भी मस्त हो गयी थी, मेरे खड़े लैंड को देख कर. लैंड देखते हुए धीरे धीरे खड़े खड़े अपनी जांघें रगड़ रही थी.

"सिर्फ दूध पिने की बात हुई है बाबूजी, ये समझ लो." मंजू ने मुझे उलाहना दिया. फिर गीता को मीठी फटकार लगायी "और सुन ऋ छिनाल लड़की. मेरी इजाजत के बिना इस लैंड को हाथ भी नहीं लगाना, ये सिर्फ तेरी अम्मा का है"

"अम्मा , ये क्या? मेरे को भी मज़ा करने दे ना & कितना मतवाला लैंड है, तू बता रही थी तो भरोसा नहीं था मेरा पर ये तो और खूबसूरत निकला" गीता मचल कर बोली. उसकी नजरें मेरे लैंड पर गाड़ी हुई थीम. बड़ी चालु चीज़ थी, जरा भी नहीं शर्मा रही थी, बल्कि छुड़ाने को मरी जा रही थी.

"बदमाश कहीं की, तू सुदरेगी नहीं, मैंने कह ना फिर देखेंगे. अभी चोली निकाल और फटाफट बाबूजी को दूध पिला." मंजू ने अपनी बेटी को डांटते हुए कह.

मंजू अब मेरे लैंड को पजामे के बाहर निकाल कर प्यार से मुठिया रही थी. फिर उसने झुक कर उसे चुसना शुरू कर दिया. उधर गीता ने अपना ब्लाउज़ निकाल दिया. उसकी पपीते जैसे मोती मोती चुंचियां अब नंगी थीम. वेह एकदम फूली फूली थी जैसे अंदर कुछ भरा हो. वजन से वे लटक रही थीं.

एक स्तन को हाथ में उठाकर सहारा देते हुए गीता बोली "अम्मा देख ना, कैसे भर गए है मम्मे मेरे, आज सुबह से खाली नहीं हुए, बहुत दुखते है"

"अरे तो टाइम क्यों बर्बाद कर रही है. आ बैठ बाबूजी के पास और जल्दी दूध पिला उनको. भूखे होंगे बेचारे" मंजू ने उसका हाथ पकड़ कर खिंचा और पलंग पर मेरे पास बिठा दिया.

मैं सिरहाने से टिक कर बैठा था. गीता मेरे पास सरकी, उसकी काली आँखों में मस्ती झलक रही थी. उसके मम्मे मेरे सामने थे. निप्पलों के चारों और तश्तरी जैसे बड़े गोले थे. पास से वे मोटे मोटे लटके स्तन और भी जयादा रसीले लग रहे थे. अब मुझसे नहीं रहा गया और झुक कर मैंने एक काला जामुन मुंह में ले लिया और चूसने लगा.

मीठा कुनकुना दूध मेरे मुंह में भर गया. मेरी उस अवस्था में मुझे वेह अमृत जैसा लग रहा था. मैंने दोनों हाथों में उसकी चूंची पकड़ी और चूसने लगा जैसे की बड़े नारियल का पानी पि रहा हूँ. लगता था मैं फिर छोटा हो गया हूँ. आँखें बंद करके मैं स्तनपान करने लगा.

उधर मंजू ने मेरा लैंड मुंह में ले लिया. अपनी कमर उछाल कर मैं उसका मुंह छोड़ने की कोशिश करने लगा. वेह महा उस्ताद थी, बिना मुझे झादाये प्यार से मेरा लैंड चूसती रही. अब तक गीता भी गरमा गयी थी. मेरा सिर उसने कास कर अपनी छाती पर भींच लिया जिससे मैं छूट ना पाऊं और उसका निप्प्ले मुंह से ना निकालूं. उसे क्या मालुम था की उसकी उस मतवाली चूंची को छोड़ दूं ऐसा मुरख मैं नहीं था. उसका मम्मा दबा दबा कर उसे दुहते हुए मैं दूध पिने लगा.

अब वेह प्यार से मेरे बाल चूम रही थी. सुख की सिसकारियां भारती हुई बोली "अम्मा, बाबूजी की क्या जवानी है, देख क्या मस्त चूस रहे है मेरी चूंची, एकदम भूखे बच्चे जैसे पि रहे है. और उनका यह लैंड तो देख अम्मा, कितनी जोर से खड़ा है. अम्मा, मुझे भी चूसने दे ना!"

मंजू ने मेरा लैंड मुंह से निकाल कर कहा "कल से, आज नहीं, वो भी अगर बाबूजी हाँ कहें तो! पता नहीं तेरा दूध उन्हें पसंद आया है की नहीं" वैसे गीता के दूध के बारे में मैं क्या सोचता हूँ, इसका पता उसे मेरे उछलते लैंड से ही लग गया होगा.

आखिर गीता का स्तन खाली हो गया. उसे दबा दबा कर मैंने पूरा दूध निचोड़ लिया. फिर भी उसके उस मोटे जामुन से निप्प्ले को मुंह से निकालने का मन नहीं हो रहा था. पर मैंने देखा की उसके दुसरे निप्प्ले से अब दूध टपकने लगा था. शायद ज्यादा भर गया था. मैंने उसे मुंह में लिया और उसकी दूसरी चूंची दुह कर पिने लगा. गीता ख़ुशी से चहक उठी. "अम्मा, ये तो दूसरा मम्मा भी खाली कर रहे है. मुझे लगा था की एक से इनका मन भर जाएगा."

"तो पिने दे ना पगली, उन्हें भूख लगी होगी. अच्छा भी लगा होगा तेरा दूध. अब बकबक मत कर, मुझे बाबूजी का लौउअ चूसने दे ठीक से, बस मलाई फेकने ही वाला है अब" कह कर मंजू फिर शुरू हो गयी

अब दूसरी चूंची भी मैंने खाली कर दी तब मंजू ने मेरा लैंड जड़ तक निगल कर अपने गले में ले लिया और ऐसे चूसा की मैं झड गया. मुझे दूध पिलवा कर उस बिल्ली ने मेरी मलाई निकाल ली थी. मैं लास्ट होकर पीछे लुधक गया पर गीता अब भी मेरा सिर अपनी छाती पर भींच कर अपनी चूंची मेरे मुंह में ठुन्सती हुई वैसे ही बैठी थी.

मैंने किसी तरह से उसे अलग किया. गीता मेरी और देख कर बोली "बाबूजी, पसंद आया मेरा दूध?" वेह जरा टेंशन में थी की मैं क्या कहता हूँ.

मैंने खिंच कर उसका गाल चूम लिया. "बिलकुल अमृत था गीता रानी, रोज पिलाओगी ना?"

वेह थोड़ी शर्मा गयी पर मुझे आँख मार कर हंसने लगी. मैंने मंजू से पूछा "कितना दूध निकलता है इसके थानों से रोज बायीं? आज तो मेरा ही पेट भर गया, इसका बच्चा कैसे पिता था इतना दूध"

मंजू बोली "अभी ज्यादा था बाबूजी, कल से बेचारी की चूंची खाली नहीं की थी ना. नहीं तो करीब इसका आधा ही निकलता है एक बार में. वैसे हर चार घंटे में पिला सकती है ये." मैंने हिसाब लगाया. मैंने कम से कम पाँव डेढ़ पाँव दूध जरुर पिया था. अगर दिन में चार बार यह आधा पाँव दूध भी दे तो आधा पौना लीटर दूध होता था दिन का.

दिन में दो तिन पाँव देने वाली उस मस्त दो पैर की गाय को देख कर मैं बहक गया.


दिन में दो तिन पाँव देने वाली उस मस्त दो पैर की गाय को देख कर मैं बहक गया. मंजू को पूछा "बोलो बायीं, कितनी तंखुवा लेगी तेरी बेटी?"

वो गीता की और देख कर बोली "पांच सौ रुपये दे देना बाबूजी. आप हजार वैसे ही देते हो, आप से ज्यादा नहीं लुंगी."

मैंने कह की हजार रुपये दूंगा गीता को. गीता तुनक कर बोली "पर काहे को बाबूजी, पांच सौ बहुत है, और मैं भी तो आपके इस लाख रुपये के लैंड से चुद्वाउन्गि रोज . हजार ज्यादा है, मैं कोई कमाने थोड़े ही आई हूँ आपके पास."
मैंने गीता की चूंची प्यार से दबा कर कहा "मेरी रानी, ज्यादा नहीं दे रहा हूँ, पांच सौ तुम्हारे काम के, और पांच सौ दूध के. अब कम से कम मेरे लिए तो बाहर से दूध खरीदने की जरुरत नहीं है. वैसे तुम्हारा ये दूध तो हजारों रुपये में भी सस्ता है" गीता शर्मा गयी पर मंजू हंसने लगी "बिलकुल ठीक है बाबूजी. बीस रुपये लीटर दूध मिलता है, उस हिसाब से महीने भर में बीस पचीस लीटर दूध तो मिल ही जाएगा आपको"

गीता ने एक दो बार और जिद की पर उस रात मंजू ने मुझे अपनी बेटी नहीं छोड़ने दी. बस उस रात को एक बार और गीता का दूध मुझे पिलवाया. दूध पिलाते पिलाते गीता बार बार छुड़ाने की जिद कर रही थी पर मंजू अदि रही. "गीता बेटी, आज रात और सबर कर ले. कल शनिवार है, बाबूजी की छुट्टी है. कल सुबह दूध पिलाने आएगी ना तू, उसके बाद कर लेना मज़ा"

गीता के जाने के बाद मैंने मंजू को ऐसा छोड़ा की वेह एकदम खुश हो गयी. "आज तो बाबूजी, बहुत मस्त छोड़ रहे हो हचक हचक कर. लगता है मेरी बेटी बहुत पसंद आई है, उसी की याद आ रही है, है ना?"

सुबह जब मंजू चाय लेकर आई तो साथ में गीता भी थी. दोनों सुबह सुबह नहा कर आई थी, बाल अब भी गिले थे. मंजू तो मादरजात नंगी थी जैसी उसकी आदत थी, गीता ने भी बस एक गीली साडी ओढ़ रखी थी जिसमे से उसका जोबन झलक रहा था.
"ये क्या, सुबह सुबह पूजा वूजा करने निकली हो क्या दोनों?" मैंने मजाक किया. गीता बोली "हाँ बाबूजी, आज आपके लैंड की पूजा करुँगी, देखो फूल भी लाइ हूँ" सच में वेह एक दलीय में फूल और पूजा का सामान लिए थी. बड़े प्यार से उसने मेरे लैंड पर एक छोटा टिका लगाया और उसे एक मोगरे की छोटी माला पहना दी. उपर से मेरे लैंड पर कुछ फूल डाले और फिर उसे पकड़कर अपने हाथों में लेकर उस पर उन मुलायम फूलों को रगड़ने लगी. दबाते दबाते झुक कर अचानक उसने मेरे लैंड को चूम लिया.

मैं कुछ कहता इसके पहले मंजू हंसती हुई मेरे पास आकार बैठ गयी. मेरा जोर का चुम्बन लेकर अपनी चूंची मेरी छाती पर रगड़ते हुए बोली. "अरे ये तो बावरी है, कल से आपके गोरे मतवाले लैंड को देख कर पागल हो गयी है. बाबूजी, जल्दी से चाय पियो. मुझे भी आप से पूजा करवानी है अपनी चूत की. आप मेरी बुर की पूजा करो, गीता बेटी आपके लैंड की पूजा करेगी अपने मुंह से."

मेरा लैंड कास कर खड़ा था. मैं चाय की चुस्की लेने लगा तो देखा बिना दूध की चाय थी. मंजू को बोला की दूध नहीं है तो वेह बदमाश औरत दिखावे के लिए झूट मूत अपना माथा थोक कर बोली " हाय, मैं भूल ही गयी, मैंने दूध वाले भैया को कल ही बता दिया की अब दूध की जरुरत नहीं है हमारे बाबूजी को. अब क्या करे, चाय के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं. वैसे फिकर की बात नहीं है बाबूजी, अब तो “घर का दूध” है, ये दो पैरों वाली दो थानों की खूबसूरत गैया है ना एहन! इ गीता, इधर आ जल्दी"

गीता से मेरा लैंड छोड़ा नहीं जा रहा था. बड़ी मुश्किल से उठी. पर जब मंजू ने कहा "चल अब तक वैसे ही साडी लपेटे बैठी है, चल नंगी हो और अपना दूध डा जल्दी, बाबूजी की चाय मैं" तो तपाक से उठ कर अपनी साडी उतर कर वेह मेरे पास आ गयी. उसके देसी जोबन को मैं देखता रह गया. उसका बदन एकदम मांसल और गोल मटोल था, चुंचियां तो बड़ी थीं ही, चूतड भी अच्छे खासे बड़े और चौड़े थे. गर्भावस्था में चढ़ा मांस अब तक उसके शारीर पर था. जांघें ये मोती मोती और पाँव रोटी जैसी फूली बुर, पूरी बालों से भरी हुई. मैं तो झाड़ने को आ गया.

"जल्दी दूध दाल चाय में" मंजू ने उसे खिंच कर कहा. गीता ने अपनी चूंची पकड़ कर चाय के कप के उपर लाइ और दबा कर उसमे से दूध निकालने लगी. दूध की तेज पतली धार चाय में गिरने लगी. चाय सफ़ेद होने तक वेह अपनी चूंची दुहती रही. फिर जाकर मेरी कमर के पास बैठ गयी और मेरे लैंड को चाटने लगी.

मैंने किसी तरह चाय ख़तम की. स्वाद अलग था पर मेरी उस अवस्था में एकदम मस्त लग रहा था. मेरा सिर घुमने लगा. एक जवान लड़की के दूध की चाय पि रहा हूँ और वही लड़की मेरा लैंड चूस रही है और उसकी मान इस इन्तजार में बैठी है की कब मेरी चाय ख़तम हो और कब वेह अपनी चूत मुझसे चुस्वाये.

मैंने चाय ख़तम करके मंजू को बांहों में खिंचा और उसके मम्मे मसलते हुए उसका मुंह चूसने लगा. मेरी हालत देख कर मंजू ने कुछ देर मुझे चूमने दिया और फिर मुझे लिटा कर मेरे चहरे पर चढ़ बैठी और अपनी चूत मेरे मुंह में दे दी. "बाबूजी, अब नखरा ना करो, ऐसे नहीं छोदुंगी आपको, बुर का रस जरुर पिलाउंगी, चलो जीभ निकालो, आज उसीको चोदूंगी"

उधर मंजू ने मुझे अपनी चूत का रस पिलाया और उधर उसकी बेटी ने मेरे लैंड की मलाई निकाल ली. गीता के मुंह में मैं ऐसा झाडा की लगता था बेहोश हो जाऊँगा. गीता ने मेरा पूरा वीर्य निगला और फिर मुस्कराते हुए आकार मान के पास बैठ गयी.
मंजू अब भी मुझ पर चढ़ी मेरे होंठों पर अपनी बुर रगड़ रही थी. "क्यों बेटी, मिला प्रसाद, हो गयी तेरे मन की?"

"अम्मा, एकदम मलाई निकलती है बाबूजी के लैंड से, क्या गाढ़ी है, तार तार टूटते है. तू तो तिन महीने से खा रही है तभी तेरी ऐसी मस्त तबियत हो गयी है अम्मा. अब इसके बाद आधी मैं लुंगी हाँ!" गीता मंजू से लिपटकर बोली.

एक बार और मेरे मुंह में झड कर समाधान से सी सी करती मंजू उठी. "चल गीता, अब बाबूजी को दूध पिला दे. फिर आगे का काम करेंगे" गीता मेरे उपर झुकी और मुझे लिटाये लिटाये ही अपना दूध पिलाने लगी. रात के आराम के बाद फिर उसके मम्मे भर गए थे और उन्हें खाली करने में मुझे दस मिनट लग गए. तब तक मंजू बायीं की जादुई जीभ ने अपना कमाल दिखाया और मेरे लैंड को फिर से तन्ना दिया.

गीता के दूध में ऐसा जादू था की मेरा ऐसा खड़ा हुआ जैसे झाडा ही ना हो. उधर गीता मुझसे लिपट कर सहसा बोली "बाबूजी, आप को बाबूजी कहना अच्छा नहीं लगता, आपको भैया कहूँ? आप बस मेरे से तिन चार साल तो बड़े हो"

मंजू मेरी और देख रही थी. मैंने गीता का गहरा चुम्बन लेकर कहा "बिलकुल कहो गीता रानी, और मैं तुझे गीता बहिन या बहना कहूँगा. पर ये तो बता तेरी अम्मा को क्या कहूँ? इस हिसाब से तो उसे अम्मा कहना चाहिए"

मंजू मेरा लैंड मुंह से निकाल कर मेरे पास आ कर बैठ गयी. उसकी आँखों में गहरी वासना थी. "हाँ, मुझे अम्मा कहो बाबूजी, मुझे बहुत अच्छा लगेगा. आप हो भी तो मेरे बेटे जैसी उम्र के हो, और मैं आपको बेटा कहूँगी. समझूंगी मेरा बेटा मुझे छोड़ रहा है. आप कुछ भी कहो बाबूजी, बेटे या भाई से चुदवाने में जो मज़ा है वो और कहीं नहीं"

मुझे भी मज़ा आ रहा था. कल्पना कर रहा था की सच में मंजू मेरी मान है और गीता बहन. उन नंगी चुदैलों के बारे में यह सोच कर लैंड उछलने लगा. "अम्मा, तो आओ, अब कौन चुदेगा पहले, मेरी बहना या अम्मा?"

"अम्मा, अब मैं चूदुन भैया को?" उस लड़की ने अधीर होकर पूछा.

मंजू अब तैश में थी "बड़ी आई छोड़ने वाली, अपनी अम्मा को तो चुदने दे पहले अपने इस खूबसूरत बेटे से. तब तक तू ऐसा कर, उनको अपनी बुर कहता दे, वो भी तो देखें की मेरी बेटी की बुर का क्या स्वाद है. तब तक मैं तेरे लिए उनका सोंटा गरम करती हूँ" मुझे आँख मार कर मंजू बायीं हंसने लगी. अब वेह पूरी मस्ती में आ गयी थी.


गीता फटाफट मेरे मुंह पर चढ़ गयी. "ओ नालायक, बैठना मत अभी भैया के मुंह पर. जरा पहले उन्हें ठीक से दर्शन तो करा अपनी जवान गुलाबी चूत के" गीता घुटनो पर टिक गयी, उसकी चूत मेरे चहरे के तीन चार इंच उपर थी. उसकी बुर मंजू बायीं से ज्यादा गुदाज और मांसल थी. झानतें भी घनी थीं. चूत के गुलाबी पपोटे संतरे की फांक जैसे मोटे थे और लाल छेड़ खुला हुआ था जिसमे से घी जैसा चिपचिपा पानी बह रहा था.

मैंने गीता की कमर पकड़कर निचे खिंचा और उस मिठाई को चाटने लगा. उधर मंजू ने मेरा लैंड अपनी बुर में लिया और मुझपर चढ़ कर मुझे हौले हौले मजे लेकर छोड़ने लगी. अपनी बेटी का स्तनपान देखकर वेह बहुत उत्तेजित हो गयी थी, उसकी चूत इतनी गीली थी की आराम से मेरा लैंड उसमे फिसल रहा था.

गीता के छूताद पकड़कर मैंने उसकी तपती बुर में मुंह छुपा दिया और जो भाग मुंह में आया वेह आम जैसा चूसने लगा. उसका अनार का कदा दाना मैंने हलके से दांतों में लिया और उस पर जीभ रगड़ने लगा. दो मिनट में वेह छोकरी सुख से सिसकती हुई झड गयी. मेरे मुंह में रस टपकने लगा. "आरी अम्मा, भैया कितना अच्छा करते है. मैं तो घंटे भर अपनी चूत चुस्वौंगी आज."

मैं एक अजीब मस्ती में डूबा हुआ उस जवान छोकरी की चूत चूस रहा था, वेह उपर निचे होती हुई मेरे सिर को पकड़कर मेरा मुंह छोड़ रही थी और उसकी वेह अधेड़ अम्मा मुझपर चढ़ कर मेरे लैंड को छोड़ रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे मैं क्य्कल हूँ और ये दोनों आगे पीछे बैठकर मुझपर सवारी कर रही है. मैं सोचने लगा की अगर यह स्वर्ग नहीं है तो और क्या है.

गीता हलके हलके सीत्कारियां भरते मंजू से बोली "अम्मा, चूचियां कैसी हलकी हो गयी है, भैया ने पूरी खाली कर दिन चूस चूस कर. तू देख ना, अब जरा तन भी गयी है नहीं तो कैसे लटक रही थीं."

मेरी नाक और मुंह गीता की बुर में कैद थे पर आँखें बाहर होने से उसका शारीर दिख रहा था. मैंने देखा की मंजू ने पीछे से अपनी बेटी के स्तन पकड़ लिए थे और प्यार से उन्हें सहला रही थी.

"सची बेटी, एकदम मुलायम हो गए है. चल मैं इनकी मालिश कर देती हूँ, तुझे सुकून मिल जाएगा." मंजू बोली. मुझे दिखाते हुए उसके हाथ अब गीता के स्तनों को दबाने और मसलने लगे. फिर मुझे चूमने की आवाज आई. शायद मान ने लाड से अपनी बेटी को चूम लिया था. मुझे लगने लगा की ये मान बेटी का सादा प्रेम है या कुछ गड़बड़ है?

दस मिनट बाद उन दोनों ने जगह बदल ली. मैं अब भी तन्नाया हुआ था और झाडा नहीं था. मंजू बायीं एक बार झड चुकी थी और अपनी चूत का रस मुझे पिलाना चाहती थी. गीता दो तिन बार झड़ी जरुर थी पर चुदने के लिए मरी जा रही थी.

मंजू तो सीधे मेरे मुंह पर चढ़ कर मुझे बुर चुस्वाने लगी. गीता ने पहले मेरे लैंड का चुम्मा लिया, जीभ से चाता और कुछ देर चूसा. फिर लैंड को अपनी बुर में घुसेड कर मेरे पेट पर बैठ गयी और छोड़ने लगी. मेरे मन में आया की मेरे लैंड को चूसते समय अपनी मान की बुर के पानी का स्वाद भी उसे आया होगा.

गीता की चूत मंजू से ज्यादा ढीली थी. शायद मान बनने के बाद अभी पूरी तरह टाइएत नहीं हुई थी. पर थी वैसी ही मखमली और मुलायम. मंजू ने उसे हिदायत दी "जरा मन लगा कर मजे लेकर छोड़ बेटी नहीं तो भैया झड जायेंगे. अब मज़ा कर ले पूरा"

गीता ने अपनी मान की बात मानी पर सिर्फ कुछ मिनट. फिर वेह ऐसी गरम हुई की उछल उछल कर मुझे पुरे जोर से छोड़ने लगी. उसने मुझे ऐसे छोड़ा की पांच मिनट में खुद तो झड़ी ही, मुझे भी झाडा दिया. मंजू अभी और मस्ती करना चाहती थी इसीलिए चिढ गयी. मेरे मुंह पर से उतारते हुए बोली "आरी ओ मुरख लड़की, हो गया काम तमाम? मैं कह रही थी सबर कर और मज़ा कर. मैं तो घंटो छोडती हूँ बाबूजी को. अब उतर निचे नालायक"

मंजू ने पहले मेरा लैंड चाट कर साफ़ किया. फिर ऊँगली से गीता की बुर से बह रहे वीर्य को साफ़ करके ऊँगली चाटने लगी "ये तो परशाद है बेटी, एक बूंद भी नहीं खोना इसका. तू जरा टाँगे खोल, ठीक से साफ़ कर देती हूँ" उसने ऊँगली से बार बार गीता की बुर पूंछी और छाती. फिर झुक कर गीता की जांघ पर बहे मेरे वीर्य को चाट कर साफ़ कर दिया. मेरे मन में फिर आया की ये क्या चल रहा है मान बेटी में.

दोपहर का खाना होने के बाद गीता ने फिर मुझे दूध पिलाया और चुदाई का एक और दौर हुआ. शाम को उठकर मैं क्लब चला गया. रात को वापस आया तो खाने के बाद फिर एक बार गीता का दूध पिया और फिर मान बेटी को पलंग पर आजू बाजू सुलाकर बारी बारी छोड़ा. गीता के दूध की अब मुझे आदत होने लगे थी.

दुसरे दिन रविवार था. मैंने थोडा अलग प्रोग्राम बनाया. सुबह गीता का दूध पिया और फिर दोनों मान बेटी की चूत चूस कर उन्हें खुश किया. बस मेरे लैंड को हाथ नहीं लगाने दिया. मैं दोपहर तक उसे और ताना कर खड़ा करना चाहता था.

मंजू बायीं मेरे दिल की बात समझ गयी, क्योंकि ये हर रविवार को होता था. अपने चूतादों को सहलाती हुई अपनी बेटी से बोली "गीता बिटिया, आज दोपहर को मेरी हालत खराब होने वाली है" गीता ने पूछा तो कोई जवाब नहीं दिया. मैं भी हँसता रहा पर चुप रहा. मंजू की आँखों में दोपहर को होने वाले दर्द की चिंता साफ़ दिख रही थी.

दोपहर को हम नंगे होकर मेरे बेडरूम में जमा हुए. मेरा लैंड कास कर खड़ा था. गीता ललचा कर मेरे सामने बैठ कर उसे चूसने की कोशिश करने लगी तो मैंने रोक दिया. "रुक बहना, तुझे बाद में खुश करूँगा, पहले तेरी इस चुड़ैल मान की गांड मारूंगा. हफ्ता हो गया, अब नहीं रहा जाता. चल अम्मा, तैयार हो जा"


मंजू चुपचाप बिस्तर पर ऑंधी लेट गयी "अब दुखेगा रे मुझे, देख कैसे खड़ा है बाबूजी का लैंड मुसल जैसा"

गीता समझ गयी की उसकी मान सुबह से क्यों घबरा रही थी. बड़े उत्साह से मेरी और मुद कर बोली "भैया, मेरी मार लो, मुझे मज़ा आएगा. बहुत दिनों से सोच रही थी की गांड मरवाने का मज़ा मिले. उंगली दाल कर और मोमबत्ती घुसेड कर कई बार देखा पर सुकून नहीं मिला. आप से अच्छा लैंड कहाँ मिलेगा गांड मरवाने को?"

मैं तैयार था, अंधे को क्या चाहिए दो आँखें! नई कोरी गांड में घुसने की कल्पना से ही मेरा लैंड और उछलने लगा था.

मंजू जान छूटने से खुश थी "अरे मेरी बिटिया, तुने मेरी जान बचा ली आज. चल मख्खन से मस्त चिकनी कर देती हूँ तेरी गांड, दुखेगा नहीं"

गीता को ओंधा लिटा कर उसने उसकी गुदा में और मेरे लैंड को मख्खन से खूब चुपद दिया. मैं गीता पर चढ़ा तो मंजू ने अपनी बेटी के छूताद अपने हाथ से फैलाए. उसके भूरे गुलाबी छेड़ पर मैंने सुपादा रखा और पेलने लगा. सुपादा सूज कर बड़ा हो गया था फिर भी मख्खन के कारण फचाक से एक बार में ही गांड के अंदर घुस गया. गीता को जम कर दुख होगा क्योंकि उसका शारीर एन्थ गया था और वेह कांपने लगी थी. पर छोकरी हिम्मत वाली थी, मुंह से उफ़ तक नहीं निकाली.

उसे संभालने का मौका देने के लिए मैं एक मिनट रुका और फिर लैंड अंदर घुसेड़ने लगा. इस बार मैंने कास के एक धक्के में लैंड सत् से उसके छूतादों के बिच पूरा गाद दिया था. अब वेह बेचारी दर्द से चीख पड़ी. सिसकते हुए बोली "मान मेरी, मर गयी मैं, भैया ने गांड फाड़ दी. देख ना अम्मा, खून तो नहीं निकला ना!"

मंजू उसे चिढाते हुए बोली "आ गयी रास्ते पर एक झटके में? बातें तो पटर पटर करती थी की गांड मरावौंगी. पर रो मत, कुछ नहीं हुआ है, तेरी गांड सही सलामत है, बस पूरी खुल गयी है चूत जैसी. बेटा, तुने भी कितनी बेरहमी से लैंड दाल दिया अंदर, धीरे धीरे पेलना था मेरी बच्ची के चूतादों के बिच जैसे मेरी गांड में पेला था."

"अरे अम्मा, ये मरी जा रही थी ना गांड मराने को! तो सोचा की दिखा ही दूं असली मज़ा. वैसे गीता बहाना की गांड बहुत मोती और गुदाज है, दंलोपिलो की गद्दी जैसी है, इसे तकलीफ नहीं होगी ज्यादा" मैंने गीता के चूतड दबाते हुए कहा. मेरा लैंड अब लोहे की मुस्ली जैसा उसके चूतादोम की गहराई में उतर गया था.

गीता की गांड बहुत गुदाज और मुलायम थी. मंजू जितनी टाइएत तो नहीं थी पर बहुत गरम थी, भट्टी जैसी. मई उस पर लेट गया और उसके मम्मे पकड़ लिए. उसके मोटे चूतड स्पंज की गद्दी जैसे लग रहे थे. उसकी चुंचियां दबाते हुए मैं धीरे धीरे उसकी गांड मारने लगा.

शुरू में हर धक्के पर उसके मुंह से सिसकी निकल जाती, बेचारी को बहुत दर्द हो रहा होगा. पर साली पक्की चुड़ैल थी. पांच मिनट में उसे मज़ा आने लगा. फिर तो वेह खुद ही अपनी कमर हिला कर गांड मरवाने की कोशिश करने लगी. "भैयाजी, मारो ना! और जम कर मारो, बहुत मज़ा आ रहा है! हाय अम्मा, बहुत अच्छा लग रहा है, तेरे को क्यों मज़ा नहीं आता? भैया, मारो मेरी गांड हचक हचक कर, पटक पटक कर छोड़ मेरी गांड को, मान कसम मैं मर जाउंगी"

मैंने कास कर गीता की गांड मारी, पूरा मज़ा लिया. मैं बहुत देर उसके चूतड चोदना चाहता था इसीलिए मंजू को सामने बैठकर उसकी बुर चूसने लगा, नहीं तो बेचारी अपनी बेटी की गांड चुदती देख कर खुद अपनी चूत में ऊँगली कर रही थी.

मन भर कर मैंने गीता की गांड छोड़ी और फिर झाडा. बचा दिन बहुत मजे में गया. छुट्टी होने के कारण दिन भर चुदाई चली. गीता के दूध का मैं ऐसा दीवाना हो गया था की चार घंटे भी नहीं रुकता था. हर घंटे उसकी

चुंचियां चूस लेता, जितना भी दूध मिलता पि जाता. रात को मैंने मंजू से कहा की गीता को गाय जैसा दुह कर गिलास में दूध निकाले. मेरी बहुत इच्छा थी ऐसे दूध दुहते हुए देखने की.

मंजू ने गीता को बाजू में बैठा कर उसके हाथ में गिलास थमाया. गीता ने उसे अपनी चुन्ची की नोक पर पकड़ कर रखा और मंजू ने अपनी बेटी के मम्मे दबा दबा कर दूध निकाला. गीता के निप्प्ले से ऐसी धार छुट रही थी की जैसे सच में गाय हो. पूरा दूध निकालने में आधा घंटा लग गया. बिच में मैं गीता का चुम्मा ले लेता और कभी उसके सामने बैठ कर उसकी चूत चूस लेता.

दुहने का यह कार्यक्रम देख कर मुझे इतना मज़ा आया की मेरा लैंड कास कर खड़ा हो गया. गिलास से दूध पीकर मैंने फिर एक बार गीता की गांड मारी. मंजू बहुत खुश थी की गीता के आने से उसकी गांड की जान तो छूती.

दुसरे दिन मुझे टूर पर जाना पड़ा.


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